वैलेंनटाइन्स डे और विरोधी

शनिवार, फ़रवरी 13, 2010

लो फिर आया  प्यार का त्यौहार.... 14 फरवरी  यानी वैलेंनटाइन्स डे। वैलेनटाइन्स डे और उसके विरोधियों का तो जैसे चोली दामन का साथ है। हर साल इसी दिन प्रेमी प्रेमिका को लाल गुलाब देता है तो वही दूसरी तरफ विरोधी भी प्रेमी जोड़ों के गालों पर लाल निशान भी दे देते है। यही दिन है जब एक ओर तो प्रेमी जोड़े हाथों में गुलाब लिये प्यार का इज़हार करते है तो दूसरी तरफ हाथों में तलवार लिये .संस्कृति के 'रक्षक'.....ओह माफ करियेगा.. राक्षस भी जोड़े बनाये रहते है।  जिन्हें अपनी राजनीति चमकानी है वो गिद्ध नज़र बनाये रहते है...और हमारे लैला मजनू खुद को बचाने के लिये पेंड़ों के पीछे घोंसले बनाये रहते है। अब क्या कहें पुरातन काल में ये वही समय था जब मुरली मनोहर सांवरे कृष्ण  गोपियों संग रास भी रचाया करते थे। लेकिन क्या करें ये विरोधी भी  यही समय होता है ख़ुद की उपस्थिति दर्ज कराने का  साथ ही अपनी राजनीति चमकाने का। आखिर ये कौन लोग हैं जो समाज को संस्कृति का पाठ पढा रहे हैं । क्या कभी इन्होने भगवान कृष्ण के बारे नहीं सुना। जहां आज कल लोगों के पास इतना समय नहीं होता कि वो अपने परिवार के साथ कुछ पल बिता लें  वहीं इन लोगों के पास इतना फालतू समय है कि ये लोग काम धाम छोड़कर हाथों में बैनर लिए... नारे लगाते हुए गलियों में , सड़कों पर और पता नहीं कहां कहां चक्कर लगाते है।

एक बात समझ के परे है कि ये लोग तब कहां रहते है जब बलात्कार के आरोपियों को सालों  साल सजा तक नहीं मिल पाती। आखिर ये कौन लोग हैं जो समाज को संस्कृति का पाठ पढ़ाते हैं । कितना जानते है ये विरोधी... जो वैलेनटाइन डे का विरोध करते है। इस विषय में सिवाय इसके कि ये पश्चिमी सभ्यता का पर्व है कितना जानते है ?  हीर रांझा, सोहनी महिवाल, राधा कृष्ण का नाम तो इज्जत लेते है...लेकिन रोमिया जूलियट का नाम इनके दिलों में चुभता है। तालिबान की रीति या नीति का विरोध तो बहुत करते हैं पर क्यों नहीं सोचते की अंजाने में  या फिर जानकर भी हम उन्हीं के नक्शे कदम पर चल रहे हैं।

3 टिप्पणियाँ:

मनोज कुमार ने कहा…

यथार्थ लेखन।

शरद कोकास ने कहा…

पर्दा नही जब कोई खुदा से बन्दो से पर्दा करना क्या ..जब प्यार किया तो डरना क्या ?

ऐसे ही आवाज़ उठाते रहिये।

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