चलो अपने घरों को लौट चलें...

Wednesday, February 16, 2011

दिन भर की भागदौड़ के बाद मिली दो वक्त की रोटी अब मन को निचोड़ ले रही है। लोगों के चेहरे की झूठी मुस्कान अब दिल को मरोड दे रही है। अब तो मन यही कहता है कि चलों अपने घरों लौट चलें। घर से चले थे कुछ करने..कुछ कर दिखाने...लेकिन अब दुनिया की रफ्तार देखकर लगता है कि घर की सुस्ती यहां की चहल पहल से अच्छी थी। कुछ पाने की चाहत में बड़े शहर में आने वाले हम तो कम से कम यही सोचते हैं कि मेरे परिवार के छोटे शहर की छोटी दुनिया बहुत अच्छी थी। इस शहर के आसमां पर चमकता सूरज उस सुबह की याद नहीं दिलाता, जब पापा की चिल्लाहट..और मां की आवाज उठाया करती थी। अब तो मन यही करता है कि चलो अपने घरों को लौट चलें। सालों पहले ये आवाज़ें कानों में आती..अब सिर्फ यादों में आती हैं.....

हर दिन बड़ा और रातें लंबी होती जा रही है..कभी दिन महीनों का..तो कभी रात सालों सी महसूस होती है। घड़ी की टिक टिक से रातें और लोगों के शोर से दिन कटा करता है। आंखे बंद हैं..मन बेचैन है ..ये दिमाग अगले दिन को गुजारने की कवायद में जगता रहता है। नींद कहां है ...अब तो सिर्फ बिस्तप पर लेटेकर घड़ी के कांटे जिस नंबर पर टिकते सुबह होने उतने घंटे कम हो जाते नजर आते हैं। यूं तो सूरज रोज निकलता है लेकिन सिर्फ आंखों को जगाता है....न जाने कब दिल को जगाएगा और फिर  ये दिल गले लगा लेगा उन दिन को...जब रात  में नींद ना आने पर सिर पर मां के हाथों का सहलाता स्पर्श आंखे स्वत: भारी कर देता था। अब तो दिल यही करता है कि लौट चले अपने घरों को।

अब तो डर तब लगता है जब शोर कानों में नहीं चुभता...पहले तब लगता था जब खेलते वक्त पढ़ाने आने वाले टीचर की आवाज आती थी। लेकिन अब तो वो शाम भी तो नहीं....जब स्ट्रीट लाइट की रोशनी में दोस्तों के ग्रुप में खड़े होकर किसी क्रिकेट मैच की चर्चा हुआ करती थी। स्ट्रीट लाइट्स तो यहां पर भी है लेकिन वो दोस्त नहीं। अब तो यही दिल करता है कि चलो अपने घरों को लौंट चलें......

अफसोस। अब समय निकल गया है...न उम्र वो...न दिल की सोच वही है....अरे अब तो वहां के लोग भी वो नहीं है। समय सब बदल देता है। लेकिन फिर भी मन यही कहता है कि चलो अपने घरों को लौट चलें.....कम से कम शांति की तलाश की आशा तो अभी जिंदा है......

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