हां मुझे राजनेताओं से डर लगता है....

मंगलवार, जून 30, 2009

(नोट- सच्ची घटनाओं पर आधारित है, मेरे द्वारा देखी गई)

ये भी एक ऐसा सच है जिसे सुनकर हो सकता है कि कुछ लोगों को हंसी आ जाये लेकिन क्या करें डर लगता है तो लगता है। मै एक बार लखनऊ से आते वक्त रेलवे स्टेशन पर अपनी ट्रेन के इंतजार में खड़ा था। कुछ ही देर में मैने देखा कि मेरे आसपास खड़े लोग किसी चीज़ को बड़ी ही तल्लीनता से देख रहे है। अक्सर हम लोगों से हो जाता जैसे बूढ़ा आदमी मंदिर आने पर सर झुका लेता है औऱ जैसे 22-23 साल के लड़के किसी सुंदरी को देखकर उसको बड़ी ही तल्लीनता से देखते है उसी तरह मेरे आसपास खड़े लोग एक दिशा की ओर देख रहे थे मैने भी उत्सुकतावश उस ओर देखा..मैने देखा कि कुछ पुलिसवाले हाथों बंदूक लिये खड़े थे...संख्या की बात करुं तो लगभग पांच से सात लोग होंगे। मैने देखा कि उनके पास एक आदमी और खड़ा था लेकिन वो वर्दी में नहीं था। सर पर अंगोछा बांधे, पैरों में सैंडिल, धारियों वाली शर्ट और काली रंग की पैंट। धारियां वो नहीं जैसा कि हिंदी फिल्मों में ट्रेंड है दिखाने का। बड़ा ही साधारण सा आदमी था वो लंबी सी मूंछ,भरा चेहरा गुटखा खा रहा था शायद, साथ में पुलिसवालों से हंसीमज़ाक भी कर रहा था। पुलिस वाले भी उसकी बातों पर हंस रहे थे। लेकिन एक बात जो साधारण नहीं थी वो थी उसके हाथों में पड़ी वो हथकड़ी जिसकी मोटी सी रस्सी एक मोटे से पुलिस वाले के हांथों में भी बंधी थी। एक मजेदार बात बताता हूं कि अक्सर आपने भी इस तरह की घटना देखी होगी कि बदमाशों के हाथों की हथकड़ी की रस्सी हमेशा मोटे से पुलिसवाले के हाथों में बांधी जाती है ताकि बदमाश भागे भी तो भी न भाग सके क्यों कि भारी आदमी को कहां तक घसीटेगा ...शायद.....मैने भी उसके हथकड़ी पहने सख्त से चेहरे को देखकर थोड़ा डर महसूस किया। क्यों बदमाशों से पाला ज़रा कम ही पड़ा है उस वक्त मेरी उम्र 19 के आसपास रही होगी और मीडिया जगत में मेरी इंट्री नहीं हुई थी। डर के मारे एक बार देखने के बाद मै दोबारा उन लोगों को एक टक देखा भी नहीं....हां डर की वजह से तिरछी नज़र से देख रहा था। उसी तरह जिस तरह अगर कोई स्मार्ट सा लड़का किसी लड़की को प्रेम पत्र थमा दे औऱ लड़की मना भी कर दे तो भी हर रोज वो लड़की तिरछी नज़रों से उसे देखेगी ज़रुर चाहे नाक भौं सिकोड़ ही क्यों न रही हो। उसी तरह मुझे भी बदमाश देखने की लालसा तो थी इसीलिए मै तिरछी नज़र से देख रहा था। अब डर भी लग रहा था...लेकिन डर पर काबू पाया औऱ प्रेमचंद का फैन हूं इसलिए उनकी किताब पढ़ने लगा गोदान....अभी पंद्रह से बीस मिनट हुए होंगे कि मैने फिर देखा कि लोग उसी तरफ देख रहे थे जिस तरफ पहले देख रहे थे। मुझे लगा कि फिर कोई बदमाश होगा या उसी को देख रहे होंगा जिसको पहले देख रहे थे। लेकिन जब वे लोग लगभग पांच दस मिनट तक देखते रहे तो मैने भी देख ही लिया। मै देखता हूं कि लगभग 15 से 20 पुलिसवाले, चार से पांच काले वस्त्रधारी जांबाज़, खड़े थे सबके हाथों में बंदूखे सब बड़े सख्त चेहरे से सभी की ओर घूरकर देख रहे थे। मैने भी जिज्ञासावश देखने लगा मुझे लगा कि यार लगता है कि कोई बड़ा गैंगस्टर है..... लगताहै कि कहीं पेशी होगी...फिर सोचने लगा कि यार इतने ख़तरनाक अपराधी को ट्रेनों से सफर क्यों करवाते हैं....... यार कितना रिस्क रहता है। लेकिन देखते ही देखते मेरे विचारों ने मुझे मूर्ख बना दिया। सफेद कुर्ता, सफेद पैजामा, सफेद जूते टफ्स कम्पनी के......मूंछे लंबीं काली, ...बाल काले, दोनो हाथों की आठ अंगुलियों में सोने की अंगूठियां, अब सिर्फ हीरे की पहचान है मुझे .....नगों की जानकारी कम है लेकिन वो यहां देना ग़ैरज़रुरी है, दांये हाथ में एक ब्रेसलेट सोने का , बांये हाथ में एक रिस्ट वॉच सोने की लग रही थी पर हो सकता है कि धोखा हो क्योंकि वो बार-बार कुर्तें की बांहो से ढंक जा रहा था सो मै ठीक से देख नहीं पाया.... दांये हाथ में मोबाइल संभवत: वो विंडो मोबाइल रहा होगा क्योंकि काफी चौड़ा था, सेहत में मोटा, कद ज्यादा छोटा तो नहीं पर मुझसे थोड़ा छोटा था, खड़ा था ....न तो किसी से बोलता और न हीं हंसी मज़ाक,...... हां आसपास खड़े पुलिसवाले औऱ काले वस्त्रधारी वीर जिन्हे ब्लैक कैट कमांडो कहते हैं, वो लोगों को धक्का देकर उनसे दूर रहने की हिदायत ज़रूर दे रहे थे।मुझे लगा कि चलों अच्छा है लोगों को बदमाशों से दूर रहना चाहिए। सफेदपोश महाशय कभी फोन पर बात करते तो कभी साथ में खड़े सहयोगी संभवत वो उनका पीए होगा क्योंकि रह रह कर वो उस चिल्ला भी देते थे। मैं उन्हे बड़ा अपराधी समझ बैठा था कि तभी एक भीड़ आ गई और वो नेता जी( नाम नहीं लूंगा यार कुछ तो संस्पेंस रहने दो, मुझे राजनेताओं से डर लगता है यार) के नाम के नारे लगा रही थी हाथों में बैनर लिये। .ये खेल चल ही रहा थी कि मेरी दिल्ली की ट्रेन आ गई और मेरे साथ वो दोनों लोग लाव लश्कर के साथ बैठ गये ये अलग बात है नेता जी और चमचे एसी क्लास में, मै स्लीपर में औऱ वो बदमाश जनरल कोच में। सीट पर बैठकर मै विचारों पर नये सिरे से विचार करने लगा .....कि देखों यार मै दोनों को बदमाश समझने लगा था जबकि एक तो उसमें से नेता जी थे। अभी मानसिक द्वंद चल ही रहा था कि अचानक मेरा दिमाग ठनका......फिर ख्याल आया कि यार ये नेता जी तो कई बार घोटालों, औऱ हत्याओं, साथ ही ग़ैरकानूनी रुप से हथियार रखने में नाम आता रहा है...ये अलग बात है कि साबित न हुआ हो...इनका चेहरा टीवी पर देखा था ये तो महाशय बाहुबली नेता है। तब समझ में आने लगा कि क्यों पुलिसवाले दोनो के साथ खड़े थे एक की रक्षा के लिए और एक से रक्षा के लिए। लेकिन दोनों की फितरत एक ही थी। यहां तक की काम भी एक जैसा करते थे । इसलिए इनसे तो लोगों की रक्षा करनी चाहिए। इसलिए मै कहता हूं कि यार मुझे इन राजनेताओं से बहुत डर लगता है क्योंकि पुलिस भी इनकी रक्षा करती है अगर कहीं इनसे बात बिगड़ गई तो फिर मेरी मदद कौन करेगा। जनरल कोच वाले से कर लेगा लेकिन एसी क्लासवाले से कैसे करेगा क्यों कि भाईसाहब एसी का टिकट मंहगा आता है औऱ जनरल औऱ स्लीपर का कम रुपयों में।

3 टिप्पणियाँ:

आदर्श राठौर ने कहा…

यार...
तुझमें कुछ तो है...
निरंतर आगे बढ़ेगा....
यूएसपी को बनाए रखना...
आदर्शवाणी झूठ नहीं होती

राजेश उत्पल ने कहा…

भाई साहब कमाल की लेखनी है आपकी....
मै भी इन घटनाओं से मिल चुका हूं पर मै कभी इतनी गहराई से नही सोच सका

Pankaj Mishra ने कहा…

U r right sir!

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