अरे कोई तो बचाओ हॉकी को....

मंगलवार, जनवरी 12, 2010

अब अगर मेजबान देश के खिलाड़ी ही किसी टूर्नामेंट में भाग न ले रहे हो तो इससे ज्यादा शर्मनाक बात और क्या हो सकती है। आप, हम, और सबको पता है कि हमारा राष्ट्रीय खेल हॉकी है, लेकिन इसकी हालत राष्ट्रीयता जैसी ही हो गयी है। मध्धम बहुत मध्धम। हॉकी को पहले गिल ने चबाया अब जो बिना रस का लच्छा बचा है उसे हॉकी इंडिया के सदस्य चूसे जा रहे है। कुछ दिनों बात ही भारत में हॉकी विश्वकप होने जा रहा है। पहली बार जब ये जानकारी मिली तो बहुत आश्चर्य हुआ, वो इसलिये कि कमाल है कि विश्व कप जैसा बड़ा आयोजन हो रहा है और टीवी चैनल्स पर प्रचार तक नहीं आ रहे है।


हॉकी का इतना बड़ा त्यौहार सर पर है और लोकल ट्रेनों में सफर करने वाले देश के राष्ट्रीय खेल हॉकी, के अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी प्रैक्टिस तक के लिये मैदान में नहीं उतर रहे है। अब करें भी तो क्या करें। क्योंकि सरकारी तंत्र की तरह चलने वाले हॉकी इंडिया ने खेल के लिये मिलने वाले पैसों से इतने मज़े कर लिये है कि खिलाडियों को उनका हक तक नहीं मिल रहा है। नौबत ये आ गयी है कि हॉकी खिलाडियों ने भत्ता न मिलने पर बबाल काट दिया है। हॉकी खिलाड़ियो ने मांग रखी है कि उनको  उनके हक के पैसे दिये जायें। लेकिन पैसे हों तब न। हॉकी इंडिया के सदस्यो ने सहारा की तरफ से मिली स्पांसरशिप के पैसों को मौज के लिये खर्च कर दिया और उन पैसों में से चवन्नी भी  खिलाडियों के खाते में नहीं गयी।

देश में जब जब हॉकी सुधरने की स्थिति में पहुंची है, तब तब ऐसे हालात पैदा हुए है कि खेल सिर्फ धरातल की ओर ही गया है। खिलड़ियों की मांग जायज है और हमेशा कि तरह हॉकी इंडिया गलत है। लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या हर बार की तरह मुद्दा यहीं पर गर्म होकर ठंडा हो जायेगा, या फिर इसका एक स्थाई हल निकलेगा। खिलाडियों को धमकियां दी जा रही है कि या तो वो मान जाये या फिर टीम से हट जाये। एक कहावत है कि उल्टा चोर कोतवाल को डांटे, उसी तर्ज पर हॉकी इंडिया के सदस्य, खिलाड़ियों पर दबाव बना रहे है कि या तो वो प्रैक्टिस पर लौट जाये या फिर उन्हें टीम से हटा दिया जायेगा। हॉकी इंडिया की तानाशाही की हालत ये है कि उन्होने पहले ही 22 खिलाड़ियो की सूची तैयार कर ली है, जो कि वैकल्पिक रुप से इस्तेमाल की जायेगी, भारतीय खिलाडियों के न खेलने की दशा में।

कितना शर्मनाक है हॉकी इंडिया के लिये कि खिलाडियों को खुद आगे आकर कहना पड़ रहा है कि स्पांसर से मिले पैसों में से कुछ पैसे खिलाडियों को भी मिलने चाहिये। लेकिन हॉकी इंडिया कहता है कि उनके पास पैसे ही नहीं है। फिलहाल हॉकी में चल रही उठापटक खत्म नहीं हुई है। और इसके लिये इंडियन हॉकी फेडरेशन भी पहल नहीं कर रही है। अब वो भी क्या करे क्योंकि उनके हाथ पहले से ही काले है। इस मसले में पड़ कर वो अपनी गर्दन छुड़ा रहे है।

देश की शान रहे इस खेल के खिलाडियों की  हालत देखकर कहीं न कही हॉकी के जादूगर ध्यानचंद की आखों में भी आंसू होगें। लेकिन दुख है कि वो कुछ कर नहीं सकते है। और अगर वो होते तो यही कहते कि आखिर क्यों हॉकी को इस देश का राष्ट्रीय खेल बनाया गया जब इसकी कद्र किसी को नहीं है।

7 टिप्पणियाँ:

मनोज कुमार ने कहा…

स्थिति दुखद और चिंताजनक है।

महाशक्ति ने कहा…

दुर्दशा हो गई है हॉकी की भगवान ही मालिक है इस राष्‍ट्रीय खेल का।

बी. एन. शुक्ल ने कहा…

सत्य कहा आपने। हम भारतीय सैकड़ों सालों से गोरी चमड़ी के प्रति आकर्षित होते आये हैं और इसी क्रम में क्रिकेट का बुखार सभी के सिर चढ़ कर बोलता है क्योंकि यह गोरी चमड़ी वालों का खेल है। जब चिरकुट से लेकर सरकार तक क्रिकेट के दिवाने रहेंगे तो चैनल तो उसे कैश करेंगे ही। हाकी का जब कोई नामलेवा ही नही होगा तो चैनल उसे क्योंकर दिखायेंगें? हॉकी की मिट्टी पलीद करने में सभी का योगदान है। आज का अविभावक अपने बच्चों के लिये क्रिकेट का बैट तो उसे तीन साल की उम्र में लाता है पर क्या कभी हॉकी स्टिक बच्चों के लिए खरीदी है, शायद नही, तो हॉकी का पतन तो होगा ही। अब तो क्रिकेट को रष्ट्रीय खेल का दर्जा देने का माँग होने लगी है।अभी देखते जाइए हॉकी के खेल के बारे में आने वाली पीढ़ी केवल किताबों में ही पढ़ेगी कि कभी यह खेल हमारे देश का राष्ट्रीय खेल था और इसे हॉकी स्टिक से खेला जाता था, यकीन मानिये तब बच्चे यही पूछेंगे कि हॉकी में ध्यान चन्द ने कितने रन बनाए।

मोहसिन ने कहा…

Aap accha likhte hai. Mere blog me aakar tippani karne evem protsahit karne ke liye aabhar.

इंडियन हॉकी फेडरेशन ने कहा…

हम जल्द ही समस्या को हल करेंगे। आप इस तरह हम पर सवाल न उठाएं

Aadarsh Rathore ने कहा…

अच्छा लेख लिखा हबै

शशांक साहब इतने अच्छे विचारक होकर भी आप कैसे दूसरों की दी हुई झप्पी को सच मान रहे हैं। साहब आपकी टिप्पणी गणतंत्र दिवस पर पढ़ी। झंकझोर दिया। एक तरफ आप देश में हॉकी जैसे राष्ट्र खेल पर सरकारों को कटघरें में खड़े कर रहे हैं। दूसरे तरफ आप देश में साठ साल तक सिर उठा कर जीने की दुहाई दे रहे हैं। साहब हॉकी तो केवल अंश मात्र है यहां के ओछी राजनीति की। सोचिए देश के बाकी मसलों का क्या हाल हो रहा होगा। वैसे आप ये भी कह सकते हैं कि आप ने थोड़े ठेका ले के रखा है कि इन सभी मसलों पर वक्त जाया करें। बेशक नहीं लेकिन अगर आप समाज में किसी भी चीज पर जागरुकता रखते हैं तो जाहिर है आपसे अपेक्षा भी बढ़ जाती है। साहब एक बार संविधान को बारीकी से समझें और इतिहास को खंगाले। तो पता चलेगा कि सरकारी एजेंडा कहां-कहां लागू किया गया है। साठ साल से कौन सर उठा के जी रहा है। वो हम भी जानते हैं और आप भी बखूबी समझ रहे हैं। आप तो कम से कम उन जमात में नहीं शामिल हों जहां खानदानी नेता होते हैं। बिल्कुल सामंतवादी अदांज में। शासन उनका मेन ध्येय होता है ना कि सेवा करना। मैने नहीं देखा है किसी आम भारतीय को सीर उठा के जीते हुए इन साठ सालों में। बस देखा है तो कचहरी के चक्कर लगाकर मरते हुए, पुलिस की लाठियां खाते हुए। घर से बेघर होते हुए। भूख से छिछियाते हुए। दंगों की भेंट चढ़ते हुए। नेताओं की जी हजूरी करते हुए। खोखली शिक्षा में अपना पैसा गंवाते हुए। ज़मीदोज होते हुए। साहब क्या-क्या बताऊं। ये नौकरशाहों की और आधुनिक राजनीतिशाहों की भाषा मत बोलो........

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