मोबाईल गुमशुदा ही क्यों होता है.......

शुक्रवार, जुलाई 10, 2009

28 जून को मेरा मोबाइल और पर्स मेरे ही घर से चोरी हो गया। कुछ दिनों तक तो मुझे लगा कि मेरा मोबाइल घर में ही कहीं रखा होगा। वो अक्सर इतना लगाव हो जाता है कि कुछ यकीन ही नहीं होता है। कुछ दिन बाद यकीन हो गया कि मेरा मोबाइल घर से ही चोरी हो गया है। चैनल में काम करता हूं तो टाइम नहीं मिल पाया कि पोलीस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई जा सके। चूंकि मोबाइल घर से चोरी हुआ था तो मेरे घर थाना सेक्टर 24 में आता है।मै समय निकालकर थाने मे पहुंचा पहली बार किसी अपने किसी काम से थाने में आया था। थाने में प्रवेश करते ही मैने देखा कि हर कोई अपने काम में मग्न था आम आदमी वहां पहुंचे तो उनकी भाषाओं को समझने मे काफी देर लग जाये। एक तो एक दम अक्खड़, सख्त से चेहरे, लंबे चौड़े साथ में कुछ छोटे कद के भी थे। कुल मिलाकर जब मै वहां पहुंचा तो करीब 10 लोग होंगे। हा कुछ लोगो बंदीग्रह में भी थे गर्मी की वजह से वहां दरवाजे के बाहर एक पंखा लगा था। अंदर पानी की बोतल थी लेकिन ज्यादा झांक नहीं सका क्योंकि वहा पर अंधेरा बहुत था। एक कमरा था जिसमें थाना प्रभारी निरीक्षक लिखा था साथ में जो उस वक्त वहां नियुक्त थे उनका नाम..प्रभारी निरीक्षक का नाम था कैलाश चंद। दूसरे कमरे में जाने से पहले बाहर ही कुछ कुर्सियां औऱ रखी हुई थीं और एक पुलिस की वर्दी में महाशय बैठे थे नाम था फतह सिंह। अब मै उनके पास कमरे में गया जहां पर कुछ लिखा पढ़ी का काम चल रहा था। मैने वहां जाकर अपनी बात कही कि भाई साहब मेरा मोबाइल चोरी हो गया है क्या आप रिपोर्ट लिखेंगे। उन्होंने कहा क्यों नहीं मैने कहा कि तो फिर एक पर्चा दे दीजिए। उन्होने तुरंत एक पर्चा दे दिया। मैने तुरंत लिखा सारी जानकार लिख दी कि मेरा मोबाइल और पर्स मेरे घर में चोरी हो गया है। ये घटना सुबह आठ बजे से नौ बजे के बीच की है। और भी कई जानकारी लिखी और लेकर वहां गया तो उन्होने कहा कि यार ये राम कहानी क्यों लिख दी बस इतना करों कि ये लिख दो मोबइल गुम हो गया है। मै दोबारा पर्चा लेकर गया औऱ मैने फिर वहीं बातें लिखी जो पहले लिखी थीं। इस बार दो पर्चें लेकर गया था। मैने कहा कि भाई साहब मेरा मोबाइल चोरी हुआ है न कि गुम। उन्होने मेरी तरप नाक सिकोड़कर कहा कि तो फिर ऐसा करो कि साहब से मिलकर आजाओ। मै तुरंत कैलाश चंद के पास गय़ा जो कि वहां के थाना प्राभारी थे। उन्हे पूरी बात बताई फिर उन्होने कहा कि ठीक है जाकर पर्चा दे दो। मै वापस आया तो वो दूसरे साहब जी मानने को तैयार नहीं हुए कि फोन चोरी हुआ है। वो दोबारा लेकर गये पर्चा कैलाश जी के पास। वापस आये तो तेवर बदले हुए थे। मुझे समझाने लगे बोले कि यार फोन गुमशुदा ही होता है चोरी नहीं होता। मैने कहा कि क्यों जब मेरे घर से मोबाइल चोरी हुआ है तो मै गुमशुदा कि रिपोर्ट दर्ज क्यों करवाउँ। उन्होने बारामदे में बैटे मोटे से पुलिस वाले के पास भेज दिया, कुछ देर मुजे टरकाया लेकिन जब मै न माना तो मुझे उस मोटे से पुलिस वाले के पास भेजा। उनका नाम था फतह सिंह, मोटे से, गोल चेहरा सख्त चेहरा, सांवला सा रंग, बाहर बैठे थे बारामदे में पर्चा लेकर बोले कि फोन कैसे चोरी हुआ, मैने कहा कि मेरा भाई सुबह कोचिंग के लिए निकला और मुझे बाताये बगैर वो दरवाजा बंद करके चला गया लेकिन दरवाजा पूरी तरह से बंद नहीं था। मै उठा आठ बजकर पचास मिनट पर मैने देखा कि मेरी पर्स और मोबाइल वहां नहीं था। इतना कहते ही फतह सिंह बोले कि आपकी लापरवाही है इसमें हम क्या कर सकते हैं। मैं उनकी बात सुनकर सन्न रह गया। मुझे ऐसे जवाब की आशंका नहीं थी। मै उस वक्त क्या कहूं ये मुझसे कहते नहीं बन रहा था क्योंकि मै तो वहां मदद मांगने गया था। पर मैं बोला भाई साहब दरवाजा खुला था इसका मतलब ये तो नहीं कि आपका काम खत्म हो जाता है दरवाजा बंद होने से या खुला होने से। आप मेरी रिपोर्ट लिखिये। वो बोले कि ऐसा करों कि गुमशुदगी कि रिपोर्ट दर्ज करवा दो। मैने कहा कि नहीं फोन चोरी हुआ है। उन्होने मुझसे कहा कि फोन चाहिए या नहीं। मैन कहा कि चाहिए। तो बोले कि तो फिर गुमशुदगी कि रिपोर्ट दर्ज करवाओ। मैने कहा कि चोरी कि रिपोर्ट दर्ज करवाने पर नहीं मिलेगा इसका मतलब। वो बोले ऐसा है कि गुमशुदगी कि रिपोर्ट दर्ज करवाओं वर्ना कहीं और जाओ। मैने कहा कमाल की बात कर रहे है आप मैरे घर इस थाने के अंदर आता है तो मै और कहा जाउंगा। इस पर उन्होने कहा कि मै नहीं लिखुंगा ऱिपोर्ट कहीं औऱ जाकर लिखवाओं। अब मेरे मुझे जो झटका लगा वो शायद ज्यादातर लोगों को लगता होगा जो लोग पुलिस स्टेशन मे आते होंगे। मै अभी तक सोचता था कि पता नहीं लोग कैसे कहते है कि पुलिस स्टेशन पर रिपोर्ट नहीं लिखी जाती। लेकिन उनका गुस्सा और मुजरिमों को डराने वाले अंदाज को देखकर मै तो बिलकुल नहीं डरा हां अक्सर लोग डरकर उनकी बात मान जाते होंगे। मैने कहां कि तो फिर ठीक आप मुझे लिख कर दे दीजिए कि आप मेरी रिपोर्ट नहीं लिखेंगे। उन्होने कहा नहीं दूंगा और मेरा प्रार्थना पत्र मेरी ओर फेंक दिया उस वक्त मुझे पुलिस स्टेशनों की हालत औऱ असलियत सामने आ गई। इस बीच मुझे एक और जानकारी मिली कि दिनभर में सैकड़ों मोबाइल चोरी होते हैं कहां तक चोरी की शिकायतें लिखेगा कोई। ये बातें मुझे लिखा पढ़ी करने वाले पुलिसवाले ने बताई। मै परेशान हो गया कुछ काम न होते देख मै हताश होता लेकिन पत्रकार ठहरा हताश होना सीखा नहीं है मैने। मैने तुरंत अपने एक मित्र को फोन किया उसने अपने एक मित्र जो कि आईबीएन 7 में कार्यरत है उसके पास फोन किया ब्रजेश नाम के उस शख्स ने अपने फोन पर थाना प्राभारी से क्या बात की ये तो पता नहीं लेकिन उसके बाद मेरा काम बनता हुआ नजर आने लगा और जो पुलिस वाले अभी तक मुझपर हावी हो रहे थे वो हलके पड़ गये और फतह सिंह की डराने के अंदाज पर मित्र का एक फोन भारी पड़ गया और उन्होने कहा कि मै कुछ नहीं कर सकता आप लिखा पढ़ी वाले के पास जाइयें वो रिपोर्ट लिखेगा। मैने देखा कि पहले जो सुस्ती वो लोग दिखा रहे थे इस बार तेजी से काम हो रहा था। मुझसे दो कॉपियां लिखवा ली थी एक कॉपी खुद रख ली और अब मेरे पास तो बस वो दूसरी कॉपी है जिसमें न तो मोहर है और न ही कोई सूबूत की मैं पुलिस स्टेशन पर गया था। एक कॉपी तो उन्होने रख ली है औऱ नाम भी बता दिया है कि अश्वनी जी जांच करेंगे पर जांच होगी या नहीं ये जांच का विषय ज़रुर बन गया है।

7 टिप्पणियाँ:

आदर्श राठौर ने कहा…

भइया पुलिस वाले अगर चोरी की रिपोर्ट दर्ज करते तो उन्हें जांच करनी पड़ती और विधिवत रिकॉर्ड रखना पड़ता। इसीलिए वो आनाकानी कर रहे थे। आप तो पत्रकार थे इसलिए आपकी रिपोर्ट दर्ज हो गई। दूसरा आपके पास सबूत भी नहीं कि रिपोर्ट वाकई दर्ज हुई है या नहीं। कानूनी प्रक्रिया ही इनती जटिल है कि आम आदमी की ऐसी-तैसी हो जाती है। ऊपर से अनपढ़ पुलिसियों का डर

Yachna ने कहा…

बहुत उम्दा रचना
आपने तो मेरा मन ही मोह लिया।

मौ. तारिक ने कहा…

सही कहा आदर्श जी पुलिस हमेशा बचने की कोशिश करती है पता नहीं क्यों। आखिर उनके छुपाने से जुर्म कम होते है या बढ़ते है ये कब समझ में आयेगा

अब आप की मोबाईल मिल भी गई तो आप कैसे पा लेंगे उन पुलिस वालों से...ये कभी सोचा है......

बुद्धिजीवी ने कहा…

यार मोबाइल तो भूल ही जाइयों...जब रिपोर्ट नहीं लिख रहे है तो पता नहीं जांच करेंगे या नहीं। सामान तो भूल जाओं.कानून इतना पेचीदा है कि कोइ समझ ही न पाये।

Abhishek Prasad ने कहा…

ye india ka kanoon hai jo indians ke liye hi musibat hai... ye to aapke sath huyi chhoti si ghatna hai, kisi din fursat mile to police station ke saamne din bita kar dekhiyega... sach kahta hun apne desh par itna garv kee aap khud ko jameen par nahi payenge...

बात तो सही कही है आपने अभिषेक जी मै अक्सर ये करने की कोशिश करता हूं किसी का पर्स अगर बस में चोरी हो जाता है तो कहता हूं पुलिस रिपोर्ट दर्ज करवाओं तो कहतें है लोग कि क्या करना दर्ज करवाके मुझे ही फंसा देगें। दूसरा कोई भी थाना क्षेत्र मानने को तैयार नहीं होता कि उनके क्षेत्र में पर्स चोरी हुआ है। ताकि कहीं उनके क्षेत्र का रिकॉर्ड न दर्ज हो जाये

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