प्रिय मां
तुम चिंता मत करना मै ठीक हूं। यहां भारत में मेरे भाई लोग मेरी अच्छे से ख्याल रख रहे हैं। मेरी अच्छी ख़ातिरदारी हो रही है। कोई मुझे कुछ नहीं कहता है सब मुझसे अच्छा व्यवहार करते है। मां एक दिन तो मेरे ख़ातिरदारी करवाने की हद तोड़ दी मैने....मैने जेल के अधिकारियों से जेल का खाना नहीं मटन बिरयानी की मांगी पर जज नहीं माना नहीं तो मुझे वो मिल जाती...लेकिन चलो कोई बात नहीं बाकी सब चीज़े तो ठीक है..मुझे किताब मिलती है पढ़ने के लिये वो मेरा टाइम पास नहीं होता जेल में... मेरे रहने की व्यवस्था तो ठीक है लेकिन बाहर नहीं जाने देते यही ग़लत है यहां भारत में...लेकिन यहां मेरे कई दोस्त हो गये हैं जो अलग अलग जुर्म में यहां सज़ा काट रहे हैं..कोई अपनी बीवी के कत्ल में सज़ा काट रहा है तो कोई बलात्कार में जुर्म में लेकिन मज़ा है.. सब मेरे ही भाई है। हर कोई यहां मुझे बडे़ भाई की तरह मानता है क्योंकि मैने बड़ा काम किया था न इसलिये...मां तेरे बेटे ने तेरा और अपने देश का नाम रोशन किया है। लेकिन एक बात गलत है मेरे देश का नाम रोशन नहीं हो रहा है क्योंकि यहां पर तो हर कोई मान रहा है कि मै पाकिस्तानी हूं लेकिन मेरा अपना देश ही ये नहीं मान रहा है कि मै वहां का हूं ये बात रह रह कर मुझे खलती है। वहां का क्या हाल है मां मुझे पता चला है कि आईएसआई ने तुम्हें कहीं छुपा कर रखा है। चलो कोई बात नहीं मां ये तुम्हारी और मेरी सुरक्षा के लिये है मां थोड़ा कोऑपरेट करना उनसे...क्योंकि वो नहीं चाहते कि पाकिस्तान फंस जाये औऱ तुम्हे या मुझे कोई परेशानी न हो। मां तुम तो मुझे कुछ ज्यादा न खिला पाई लेकिन यहां भारत में मेरा वेट पांच किलो बढ़ गया है। मां तुझे तो पता था कि मुझे हार्निया है। लेकिन परेशान मत होना पाकिस्तान में तो मेरा इलाज नहीं हो पाता लेकिन यहां भारत में मेरा ठीक से इलाज चल रहा है और मेरी हालत में सुधार है। मां यहां साफ सुथरा खाना मिलता है..मेरे लिये अलग से खाना बनाने वाला आता है और वो यहीं रहता है..यहां मुझे खतरा है कि कहीं कोई मुझे ज़हर न दे दे खाने में...लेकिन तुम घबराओ मत यहां मैं हाईसिक्योरिटी में हूं मुझे कुछ नहीं होगा। मेरे ऊपर केस चल रहा है लेकिन परेशान मत होना मैं कभी न कभी छूट जाउंगा। यहां का कानून बहुत मददगार है हम जैसों को माफ कर देता है..तुम याद करो... कई अपने साथी पकड़े जाते है तो वो यहीं की जेलों में रहते हैं। बहुत से अपने भाई मिले हैं। मां विश्वास करना कसम से खा खा कर इतने मोटे हो रहे हैं कि बस पूछो मत। मां यहां पर आतंकी घटना वाले ही नहीं... नकली नोट में पकड़े गये..हथियार के साथ पकड़े गये..और आतंकी घटनाओं को अंजाम देने आये बहुत से अपने साथी यहां पर मिले वो सभी मुझसे मिल कर बहुत खुश हुए उनकी आंखों से आंसू आ गये। वो शाबासी दे रहे थे कि तुमने वो कर दिखाया जो हर कोई नहीं कर सकता है और जिसमें हम फेल हो गये थे । उसको तुमने कर दिखाया। मां यहां से मुझे सुनवाई के लिये कोर्ट में ले जाते हैं जज जी मिलने के लिये..बड़े मज़ाकिया है वो मां. अच्छे आदमी है। मै तो उनके साथ बहुत खेल करता हूं लेकिन वो उंची कुर्सी पर बैठते है न मां इसलिये कुछ कहते नहीं है। कभी कभी गुस्सा हो जाते हैं लेकिन चलो ठीक है इसी बहाने कुछ बोलते तो हैं वरना वहां तो सिर्फ वो दुष्ट वकील ही बोलता है.... कहता है कि उसके पास सबूत है कि मै आतंकवादी हूं। मां यहां पर आतंकवादी को गलत नजरों से देखा जाता है अपने देश की तरह नहीं कि हर मोहल्ले में तीन आतंकवादी है। लेकिन तुम चिंता मत करो मां यहां एक नेक बंदा भी वकील है जो कहता है कि वो मुझे बचा लेगा। उसने ही मुझे किताब दिलवाई थी। एक दिन तो मैने राखी बंधवाने की बात कही तो लेकिन कोई बांधने नहीं आया वो बताया है न कि यहां पर आतंकवादी को सही नहीं समझा जाता है। खैर तुम परेशान मत होना मुझे कुछ नहीं होगा मै कुछ सालों बाद छूट जाउंगा। मैंने कहा था न यहां का कानून बहुत मददगार है.. सख्त नहीं है अपने देश की तरह कि सरबजीत को बिना बात के भारतीय होने की वजह से पकड़ रखा है। ठीक है मां अब मैं सोने जा रहा हूं। तुम परेशान मत होना मै ठीक हूं। मै तुम्हे चिट्ठी लिखता रहूंगा। तुम अपना ख्याल रखना मै अपना ख्याल रखुंगा वैसे यहां मेरा ख्याल रखने के लिये बहुत से लोग हैं। खुदा हाफ़िज
तुम्हारा प्यार आतंकी बेटा
आमिर अजमल कसाब
मेरे बारे में
- शशांक शुक्ला
- नोएडा, उत्तर प्रदेश, India
- मन में कुछ बातें है जो रह रह कर हिलोरें मारती है ...
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मां चिंता मत करना मै ठीक हूं: आतंकी अजमल कसाब
शुक्रवार, अगस्त 14, 2009प्रस्तुतकर्ता शशांक शुक्ला पर 7:24 pm 12 टिप्पणियाँ
लेबल: हास्य व्यंग
भाई साहब मै अब बस में सफ़र नहीं करता??
गुरुवार, अगस्त 06, 2009प्रस्तुतकर्ता शशांक शुक्ला पर 10:21 am 4 टिप्पणियाँ
लेबल: हास्य व्यंग
मायावती का पूरक बजट, मै हूं हिमायती!!!!!
मंगलवार, अगस्त 04, 2009उत्तर प्रदेश की या तो किस्मत खराब है या तो यहां के नेता ज़रुरत से ज्यादा ही स्याणे हो गये हैं, या ये भी हो सकता है कि दोनों ही हो। जिस तरह का पूरक बजट आया है उसे देखकर लग रहा है कि उत्तर प्रदेश के 47 से ज्यादा ज़िले सूखाग्रस्त हुये ही न हो। प्रदेश में 47 ज़िले सूखा ग्रस्त घोषित हो चुके हैं लेकिन इस बजट को देखकर लोगों को ये लग रहा होगा प्रदेश सूखाग्रस्त नहीं मूर्तित्रस्त है। जिस कारण यहां हर रोज़ कभी हाथी तो कभी सुश्री मायावती अपनी औऱ साथ में उनके गुरु काँशीराम की मूर्तियां लगवाई जा रही हैं। आपको बता दूं कि मूर्ति में होने वाला खर्च है लगभग 512 करोड़ से ज्यादा लेकिन आपको ये जानकर औऱ ज्यादा शर्म आयेगी कि सूखाग्रस्त ज़िलों के लिये सिर्फ 250 करोड़ रुपये खर्च का बजट लाया गया है। शर्म इसलिये कि यार हमने ही तो चुना है मायावती को। पता नहीं खुद ने या किसी और ने लेकिन वोट तो हमें ही देने होते हैं। बड़ा संकट खड़ा हो जाता है जब वोटिंग का समय आता है। समझ में ही नहीं आता है कि किसे वोट दें... उस वक्त तो सभी एकदम देवता स्वरुप नज़र आते है लेकिन असली रंग दिखता है कुछ समय सत्ता में बीत जाने पर, जब पता चलता है कि घोटाले में हर किसी का नाम आया। तो फिर यूपी के लोगों तैयार हो जाओ, इस लेख में दो बातों पर ज़ोर दूंगा कि एक तो मायावती के मज़ेदार औऱ लोगों को बेवकूफ बनाने वाले पूरक बजट पर.....दूसरा क्या इस वक्त उनके अलावा कोई विकल्प है आपके पास हाहाहा। जी पहले मुद्दा मायावती के पूरक बजट पर। आपको पता है उत्तर प्रदेश के लोगों को विकास नहीं पार्क चाहिये, आप कहेंगे कि क्या बात कर रहे हो यार पार्क ज्यादा ज़रुरी है या बिजली... तो मै कहूंगा कि पार्क अरे बच्चों के लिये पार्क से ज्यादा सही जगह कुछ हो सकती है ? फिर आप कहेंगे कि पार्क से ज्यादा जरुरी है शिक्षा व्यवस्था पर खर्च ताकि बच्चों के लिये पढा़ई और सस्ती हो जाये, ज्यादा से ज्यादा बच्चे पढ़ सकेंगें। लेकिन फिर भी सिर्फ मै ही नहीं इस बार तो सरकार भी कह रही है कि लोगों के लिये पार्क औऱ मूर्तियां ज्यादा ज़रुरी है। विधानसभा में इस बार 75 अरब 60 करोड़ का पूरक बजट पेश किया गया। इसमें राष्ट्रीय आपदा आकस्मिक निधि से खर्च के लिये मात्र 250 करोड़ रुपये खर्च किये जा रहे है। एक और खास बात कि राजधानी के लोगों के लिये एक खुशी की खबर है कि राजधानी के विकास में सौ करोड़ रुपये लगाये जायेंगे पता नहीं इतने खर्च होंगे कि नहीं पर पास तो हुए हैं। अब ये मत कहियेगा कि यार मेरे यहां कि नाली पता नहीं कब ठीक होगी, घर के बाहर की सड़क कब बनेगी या पता नहीं कूड़ा उठाने वाले कब आयेंगे बदबू से घर भर गया है मच्छर बहुत हो रहे है छिड़काव कब होगा यार। फिकर नॉट बजट पास हो गया सब हो जायेगा। कोई ये तो नहीं कह रहा है न पिछली बार भी विकास के नाम पर बहुत पैसे आये थे तब तो कुछ नहीं हुआ। बड़ी दिक्कत हो जाती है जब ऐसे सवाल आते हैं तो। एक और खुश खबरी पूरे प्रदेश के लोगों के लिये, अरे बता रहा हूं यार परेशान न हो। पता है कि इस बार मूर्तियों और पार्कों के लिये साढ़े पांच अरब रुपये से अधिक की व्यवस्था की गई है। कहीं से आवाज आई कि क्यों यार बिजली बहुत दिनों से नहीं आ है। क्या हुआ, कुछ नहीं यार जो लकड़ी की खम्भा लगा था आंधी में टूट गया है इस वजह से बिजली नही आ रही है। तो क्या शिकायत नहीं की क्या। की थी यार कहा तो था कि आयेगा ठीक करने.. लेकिन आया नहीं। मै बोला कि ठीक ही तो है यार सरकार पार्क काहे के लिये बनवा रही है बिजली नही आ रही है बिजली नहीं आ रही है.. जब देखो तब रोना रोते हो यार जाओ पार्कों में सो जाओ चबड़ चबड़ न करो। कोई बोला कि यार बरसात नहीं हुई मेरे खेत तो धूप में जल गये... सारी फसल बर्बाद हो गई, अब क्या करें पता नहीं सरकार कुछ करेगी या नही, मै बोला अरे कर तो रही है 250 करोड़ रुपये पास तो कर दिये है जाओ मदद मिल जायेगी। पर कैसे होगा पूरे इतने ज़िले है उनमें से 47 ज़िले सूखाग्रस्त हैं.. ऐसे में कितनों को मिलेगी मदद। मै बोला देखो भइया कम कम मत करो पहले जाओ पहले पाओ...चले जाना और हां कुछ पैसे वहां के अधिकारी को खिला देने हो जायेगा। वो बोला कि अबे लिखाड़ तूझे नहीं लगता कि जब इतने कम पैसों में सबका तो नहीं हो पायेगा, मूर्ति पर ज्यादा खर्च क्यों करें... क्यों न किसानों पर खर्च करें। मै बोला चुप कर सरकार तेरी है या मायावती की। खर्च के लिये बहाने कौन लायेगा तू कि सुश्री मायावती, वो बोला मायावती तो मै बोला तो फिर चल अपने से मतलब रख। बड़ा आया सुझाव लेकर। मायावती के पास कम है सुझाव वाले जो तू भी नया सुझाव लेकर पहुंचेगा। उनकी सरकार उनका पैसा जहां चाहे वहां खर्च करें तुझे क्या। कोई बोला कि विकास के नाम पर अक्सर लखनऊ को ही क्यों याद किया जाता है। प्रदेश मै और भी तो कई गांव व शहर हैं। मै बोला अबे वो राजधानी है बोले तो पहचान अपने प्रदेश की। और शहरों को विकास की क्या ज़रुरत है वो तो शहर है, और गांवों को गांव ही रहने दो नहीं तो अपने बच्चों को गांव कैसे दिखाओगे। मिट्टी से कैसे जोड़ोगे। हमने सुना है कि मायावती जी एक नया हेलीकॉप्टर खरीद रही हैं। तुम बे हमेशा मायावती के पीछे ही पड़े रहते हो। क्या चक्कर है ? अब क्या वो सड़क मार्ग से जायें कहीं... पुराना वाला खराब हो रहा है, तो नया तो चाहिये ही न। कितने का आयेगा हेलीकॉप्टर, यही आयेगा कुछ नब्बे लाख के आसपास का, क्यों तुम्हें कैसे पता कि उतने का आयेगा। अरे भाई पिछली बार मैने ही तो मंगवाया था। अरे हां लिखाड़ भईया हमने भी देखा था एक रात आपके पास बहुत पैसा आ गया था तो अगले दिने आपके घर के नीचे होंडा सिटी आ गई थी। ओए कौन बोला कौन बोला वो हमारी नहीं थी गिफ्ट में मिली थी। हेलीकॉप्टर बनाने वालों ने दी थी। लिखाड़ भईया हमने सुना है कि अब तो न्यायाधीशों के लिये भी होंडा सिटी कार ही खरीदी जा रही है, पिछली कहां गई, पुरानी हो गयी है तो नयी तो चाहिये ही। और इतने मामले चल रहे हैं कि न्यायाधीशों से जानपहचान तो बना के रखनी पड़ेगी ही। अब होंडा देकर अपनी संबंध मजबूत किये जा रहे है। तुम लोग भी न बस पीछे ही पड़ जाते हो। आपसी रिश्ते मजबूत करने से ही आगे काम बनता है। इतना कहकर सभी लोग चले गये अपने अपने घर ....और भी बहुत कुछ है लेकिन यहां पर यही खत्म कर रहा हूं क्यों कि लोगों को इसे जानकर ही बोरियत महसूस होने लगी है क्यों कि उनके लिये सिर्फ बिजली पानी, सड़क के अलावा कुछ सूझता ही नहीं है। बहुत सोच लिया तो चिकित्सा सुविधाओं के बारे ये अलग बात है कि इसमें कुछ नही हैं इस बार। कुछ लोग कहेंगे कि शिक्षा भी तो एक मुद्दा है, तो भाई साहब शिक्षा कब से मु्द्दा हो गया, हममें से कितनो के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। हम हर वो सच जानते हैं जो हम जानना चाहते हैं लेकिन उस वक्त हमें उस बात के जवाब का ख्याल ही नहीं आता क्योंकि सवालों में इतने उलझा जाते है कि जवाब ढूढे नहीं मिलता। ठीक इसी तरह हम जानते है कि सरकारी स्कूलों का क्या स्तर है तो कोई नहीं चाहता कि उसमें अपने बच्चों को पढ़ाये। और जो लोग पढ़ाते है वो उतने में ही खुश हैं। इन सभी चीज़ो के लिए अगर कोई दोषी है तो वो हम हैं क्यों हम है इसका जवाब भी हमारे अंदर है बस उसको ढूढना ज़रुरी है। रही बात इसके विकल्प की तो जब दिमाग में कुछ विकल्प आयेगा तो मै आपको बताउंगा नहीं तो आपके दिमाग में आये तो मुझे ज़रुर बताईगा।
प्रस्तुतकर्ता शशांक शुक्ला पर 8:57 pm 1 टिप्पणियाँ
लेबल: हास्य व्यंग
अरे सर....खुले नहीं है.. टॉफी ले लो
मंगलवार, जून 23, 2009हमारे एक ब्लागर साथी है आदर्श राठौड़। अपने ब्लाग प्याला पर लिखते है। उन्होंने अपने एक पोस्ट में उन्होंने बस वालों को दिन में एक -एक रुपये की चोरी करते हुए देख कर अपनी बात कही...
मैने सोचा की क्यों न मै भी अपनी एक मज़ेदार वृत्तांत लिखुं जिसमें शायद पढने वाले को मज़ा आये। हुआ यूं कि जैसे हर कोई शाम के समय अक्सर घरों से घूमने निकल पड़ते उसी तरह मै भी अपनी शाम की चहल पहल के लिए निकल पड़ा। बाज़ारों से होकर गुजर रहा था कि मुझे याद आया कि मेरी दवाईयों का स्टाक खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है। आपको बता दूं कि मै अपने पास दवाइयों की पूरी दुकान रखता हूं क्योंकि हो सकता है कभी भी उसकी जरुरत पड़ जाये। अक्सर मै ये दवाइयां लगभग एक ही दुकान से लेता हूं क्योंकि घर के पास हैं औऱ मिल भी आसानी से जाती है। लेकिन अक्सर वो मुझे दो या तीन रुपये के नाम पर टॉफियां दे देता था। मै भी टॉफी का अच्छा खासा शौकीन हूं इसीलिये मेरी दोस्ती शहर के कई डेंटिस्ट से है। और मै आपको बता दूं कि मुझे डिस्काउंट तक मिल जाता है। ऐसे ही एक दिन डॉक्टर ने कड़े अंदाज में कहा कि अगर आपने टॉफी खाना बंद नहीं किया तो सारे दांतों का अंतिम संस्कार करना पड़ेगा। मै मान गया। मैने अगले दिन दवाइयां लेने दुकान पर पहुंचा इस बार फिर हर बार कि तरह दुकान वाले ने मुझे टॉफी थमा दी मैने मन मारकर मना कर दिया। लेकिन उसने मुझसे कहा कि सर खुले नहीं है तो ले लीजिये। मैने उसके ट्रंक में सिक्के देख लिये थे। पर मैने कहा कि कोई बात नहीं बाद में दे देना पैसे। उसने मना कर दिया..कहने लगा कि टॉफी ही लीजिए। मैने कहा यार टॉफी मै अब नहीं खाता तो मुझे मेरे पांच रुपये दे दो। उसने टॉफी दे दी। मै वो लेकर आ गया घर आकर मैने सोचा कि दिन भर कि कमाई करने के बाद उसके पास इतने सिक्के भी नहीं थे लेकिन मैने फिर सोचा कि टॉफी के बहाने वो हर बार मुझे टॉफी लेने को मजबूर करता रहा या कहे कि मै अपने पैसे की टॉफी खरीद रहा था । और मै समझ रहा था कि उसके पास सिक्के नहीं होते इसलिए वो मुझे टॉफी देता था। इस बार मुझे उसकी चालाकी समझ में आ गई तो मैने उसकी चालाकी के लिए उसे सबक सिखाने की ठानी। मैने उसके दुकान हर बार की तरह दवाइयां लेता और वो मुझे टॉफी देता और मै सभी टॉफियों को इकट्ठा करना शुरु कर दिया तो एक दिन जब मै उसके दुकान पर गया तो उसने मुझसे दवाई के बदले पैसे मांगे चूंकी मेरी दवाई की कीमत 65 रुपये है मैने उसे 40 रुपये थमाए अब उसे इंतजार था कि मै बाकी पैसे दूंगा मैन अपने बैग से खूब सारी टॉफियां निकाली और लगभग पच्चीस रुपये की टॉफियां उसके टेबल पर पटक मारी। उसने मुझसे कहा कि भाई साहब बाकी पैसे.... मैने कहा कि दे तो दिये। ये लो बाकी पैसे की टॉफियां। उसने कहा कि क्यों मज़ाक कर रहे हो सर। क्योंकि मै एक पत्रकार हूं तो ज्यादा तेज आवाज़ या बद्तमीज़ी से बोल नहीं सकता था। इसलिए उसने मुझे घूरकर देखा..मैने उससे कहा कि क्यों ..जब आप पैसे के बदले टॉफी दे सकते हो तो मै भी पैसे के बदले टॉफियां दे रहा हूं तो क्या गलत है। रखों और खूब खाओ....या औरों को दे देना....इतना कहकर मै वापस आने लगा और वो मेरे मुंह को देखता रह गया। वहां ज्यादातर लोग मेरी इस हरकत को गौर से देख रहे थे कुछ मज़ा ले रहे कुछ हंस रहे थे। शायद दुकानवाले की समझ में कुछ तो आया होगा।प्रस्तुतकर्ता शशांक शुक्ला पर 4:20 am 1 टिप्पणियाँ
लेबल: हास्य व्यंग
चलों जूता जूता खेलें....
सोमवार, अप्रैल 13, 2009गीत पेश कर रहा हूं ज़रा ध्यान दीजिएगा औऱ जूतम पैजार का मौसम है तो मन मचल उठा कि विरोध का मुन्ना भाई की तरीका ज़रा पुराना हो गया तो एक गीत पेश है जिसकी तर्ज है "लगी आज सावन की फिर जो झड़ी है"
लगी आज जूतों की फिर जो झड़ी है.....
किसी को यहां तो किसी को वहां पड़ी है.....
जूतों से यहां खबरें बन पड़ी है...
चैनलों में जूतों पर फिल्में बन पड़ी हैं....
कभी स्वागत गृहमंत्री का तो कभी जिंदल से जुड़ी है....
लगी आज खबरों में जूतों की झड़ी हैं......
लगी आज जूतों की फिर जो झड़ी है.....
किसी को यहां तो किसी को वहां पड़ी है.....
प्रस्तुतकर्ता शशांक शुक्ला पर 5:16 am 1 टिप्पणियाँ
लेबल: हास्य व्यंग
मेरे घर आये थे 'ज़ालिम' वोट मांगने
बुधवार, अप्रैल 01, 2009अभी कल की ही बात है मैं अपने घर पर आराम कर रहा था....सोचा कि थोड़ा टीवी देख लूं ..लेकिन लोकसभा चुनाव की ख़बरें देखते देखते बोर हो गया...अब मै बस बैठा ही था कि तभी दरवाजे की बेल बजी..मैने दरवाज़ा खोला तो पाचासों लोगों की भीड़ देखकर एक बार को तो मैं डर ही गया...जब पाचास साठ आदमी आपके घर के सामने खड़े हों तो कौन नहीं डरेगा....एक बार को तो लगा कि कहीं मैने कुछ ऐसा तो नहीं किया कि मोहल्ले के लोग मेरे घर पर धावा बोलने आ गये....अरे मै एक पत्रकार हूं तो मेरा डरना तो जायज़ ही है क्योंकि दूसरों के गलती दिखा दिखा कर मैने कईयों को अपना दुश्मन बना लिया है...लोकिन गांधी सी मूरत और सूरत बनाकर एक खादीधारी मेरे द्वार पर खड़ा था हाथ जोड़े....मुझे समझते देर न लगा कि ये महाशय यहां वोट के लिए आए हैं....इससे पहले कि वो कुछ बोलते मैंने ही उनसे कह डाला कि बिलकुल जी वोट आपको ही देंगे चिंता न करें....समझदारी का परिचय देते हुए मेरे कह दिया कि मै आपको ही वोट दूंगा...इससे न तो मेरा कुछ जाता है और वो भी खुश हो जाते हैं...क्या जाता है कहने में कि वोट उनको ही देंगे भले ही मेरा नेता कोई और हो....सच में तो कभी ये बताना ही नहीं चाहिये कि आप किसे वोट देंगे क्योंकि ये तो आपका पर्सनल फैसला होता है...जैसे ही मैने दरवाजा खोला मैंने देखा कि नेता जी मुझसे वोट मांग रहे थे और साथ में खड़े हैं इनके मुशटन्डे से लोग जो बदमाश टाइप भी लग रहे थे सारे मुझे घूर रहे थे शायद ये सोच रहे हों कि'' बेटा वोट इसे ही देना नहीं तो ख़ैर नहीं" और सच बताऊं तो वो थे शहर के छंटे बदमाश क्योंकि उनमें से कुछ लोग तो वो थे जिनको सड़क पर खड़े होकर छिछोरापंती करते मै अक्सर देखा करता था...और कुछ तो वो लोग थे जो शहर के हिस्ट्रीशीटर रह चुके थे....अब वोट मांगने आए थे तो उन्हें मना करके उनसे दुश्मनी कौन ले सो मैने बोल दिया कि वोट उसे ही देंगे पर सच तो मुझे ही पता है कि मुझे वोट किसे देना है और किसे नहीं..।
प्रस्तुतकर्ता शशांक शुक्ला पर 3:30 am 0 टिप्पणियाँ
लेबल: हास्य व्यंग
"क्रिकेट" और"बॉलीवुड" की "जय हो"
गुरुवार, मार्च 19, 2009लोकसभा चुनाव के घमासान से पहले आईपीएल के लफड़े से वैसे ही लोग परेशान हैं। और दूसरी ओर ऑस्कर विजेता ए.आर रहमान की धुन से चुनाव जीतने की जुगत में लगी है, यूपीए सरकार । सुरक्षा को लेकर पहले से ही देश परेशान है और अब हमारे देश के कुछ 'सांप्रदायिक लोग' जैस ललित मोदी आईपीएल के लिए खिलाड़ियों की सुरक्षा के लिए जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं । सांप्रदायिक कहने का मेरा तात्पर्य था कि हमारे भारत देश में क्रिकेट एक धर्म हो चुका है और ललित मोदी न चुनाव देख रहे हैं और न ही खिलाड़ियों की सुरक्षा व्यवस्था क्योंकि अगर चुनाव होगें तो खिलाड़ियों का सुरक्षा कैसे मिल सकेगी और अगर उन्हें मिली तो हम आम जनता का क्या होगा,और वो क्रिकेट को लेकर कुछ भी नहीं सोच रहे हैं... मै तो ललित मोदी से कहुंगा कि अरे भाई साहब देश में चुनाव पांच साल बाद आते हैं और आपका आईपीएल तो हर साल आता है तो कम से कम इस साल तो कुछ आराम दीजिए.. दर्शकों को चुनाव के इस खेल का आनंद लेने दीजिये....शीर्षक तो मैने अपने चिठ्ठे का दिया है 'क्रिकेट और बॉलीवुड की जय हो'...क्रिकेट की चर्चा मै कर चुका और बॉलीवुड की चर्चा की वो इसलिए क्योंकि अगर बॉलीवुड न होता तो कई लोगों का सपना नेता बनकर देश चलाने का सपना अधूरा रह जाता ...यही नहीं कई पार्टीयां तो फ़िल्म स्टार को चुनावी मैदान में उतारती हैं तो कोई संगीत को ही अपना तारणहार समझ रही है..यार ये राजनेता हम आम आदमियों को कब तक बेवकूफ़ समझते रहेंगे....हर साल एक ही तरह के वादे और इरादे ज़ाहिर करेंगे ...सपा अगर बॉलीवुड की प्रोडक्शन पार्टी है तो कांग्रेस म्युज़िक लवर पार्टी है...बीजेपी भी कम पीछे नहीं है....चुनाव आने वाले हैं इस बार उसे ही वोट डालें जो बकवास कम करता हो औऱ सच में उसने आपके लिए कुछ किया हो...सिर्फ इस बीच नहीं अपने राज में हर बार और....नोट के लालच में आकर वोट न डालें नहीं सपने दिखाकर गढ्ढे में गिराना पुराना खेल है कुछ राजनेताओं का ......
प्रस्तुतकर्ता शशांक शुक्ला पर 11:54 am 0 टिप्पणियाँ
लेबल: हास्य व्यंग