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क्या मैने सही किया ?

सोमवार, अप्रैल 19, 2010

मीडिया में काम करना काफी थकाऊ होता है। दिन भर की भागदौड़, हर काम को समय से भेजने की तेजी, सभी कुछ। मेरी भी काम की शिफ्ट खत्म हो चुकी थी। थक तो काफी गया था, शाम तीन बजे से रात के 12 बजे तक की शिफ्ट है। काम खत्म करके सीधा घर आ जाता हूं। रास्ते में कही रुकता तक नहीं, सूनसान सड़कें होती है, रुकने का मन ही नहीं करता, सूनेपन से डर लगता है। बाइक पर बैठा सीधे अपने घर की ओर निकल पड़ा, रास्ते में कानों में हेडफोन लगाये मधुर संगीत का आनंद लेते हुए  खाली सड़कों पर लगभग अकेला चला आ रहा था, लगभग अकेला इसलिये क्योंकि इक्का दुक्का गाडियां मुझे और मेरी बाइक को देखती हुई निकल जा रही थी।

बस मेरे घर के पास का आखिरी चौराहा जहां से मुझे अपने कमरे के लिये मुड़ना है। चौराहे पर ही सूनसान रात में एक लड़की एक छोटे से पेड़ के नीचे खड़ी है, मैने दूर से ही देख लिया। रात के अंधेरे में सड़को पर रोशनी करती स्ट्रीट लाइट से छुपती वो लड़की किसी का इंतजार कर रही थी शायद। एक टाटा इंडिका कार जिस पर पीली पट्टी पर काले अक्षरों से नंबर लिखा था वो उसके पास जाकर रुक गयी। सोचा कि हो सकता है कि वो उसमें बैठ जाये। पर नहीं वो नहीं बैठी, वो गाड़ी के ड्राइवर से बात कर रही थी। मै उनको क्रॉस करके आगे चला जा रहा था, मेरी नजर उस लड़की पर थी, पत्रकारों की गंदी आदत नहीं जाती है, कुछ भी संदेहास्पद लगता है तो नज़रे टिक ही जाती है। मुझे एक बार के लिए लगा कि कहीं वो कैब वाले उस लड़की को छेड़ने के लिहाज़ से तो नहीं खड़े है, पर नहीं चिल्लाने की आवाज नहीं आई, पर फिर भी मै रुका, मै पलटा उसे देखने के लिये, वो लड़की सफेद सी दिखने वाली टीशर्ट में थी, अंधेरे में सावला सा दिखने वाला चेहरा था, न ज्यादा पतली ना मोटी, वहां से हिली तक, नहीं कैब वाले से बात कर रही थी।

दिमाग ठनका, मुझे यकीन हो चला की उस लड़की को कोई नहीं छेड़ रहा है, हां वो किसी का इंतज़ार ज़रुर कर रही थी। किसका ये खुद उसे भी पता नहीं होगा, पर हां जिसके पास उसकी कीमत लगाने का माद्दा होगा वही उसे ले जायेगा। उसी का लडकी को इंतजा़र था शायद, मुझे बर्दाश्त नहीं हुआ, पता नहीं क्यों पर मै वहां से सीधे घर न जा सका। आगे ही मैने मोटरसाइकिल पर सवार दो पुलिस वालों को देखा। मै उनके पास गया और उन्हे पूरी घटना बताई। घटना सुनने के बाद उन्हे समझने में देर न लगी कि वो कौन है। या फिर वो यहां क्यों खड़ी थी रात में । पुलिस को खबर करके मै सीधे अपने घर आ गया।

पर एक बात जो मेरे दिमाग में घर कर गयी कि क्या सच में वो लड़की उन्ही लड़कियों में से थी जिनको अपनी कीमत चाहिये होती है। या फिर कोई और थी। क्या मैने  सही किया पुलिस को खबर करके। पुलिस ने जो भी कदम उठाया हो।मुझे नही मालूम पर इतना ज़रूर पता है कि अगले दिन उस जगह पर पेड़ और उसकी छाया तो  थी पर वो लड़की नहीं थी। अब सोचता हूं कि पेट के लिये शायद वो ऐसा करती होगी, खुद को दोषी महसूस कर रहा हूं, सोच रहा हूं कि क्या मैने सही किया ?

शायद अंगूर खट्टे थे.....

शनिवार, अप्रैल 03, 2010

पिछले कुछ दिनों से बीमार हूं तो ऑफिस से छुट्टी ले रखी है। मुझ हर्पीस नाम की बीमारी हो गयी है, डॉक्टर कहती है कि जिस तरह बच्चों में चिकनपॉक्स होता है उसी तरह बड़ों में हर्पीस होता है। उसने कुछ दवाईयां लिखी है जिससे मुझे राहत मिलती दिख रही है। डॉक्टर ने कम्प्लीट बेडरेस्ट की सलाह दी है इसलिये छुट्टी लेनी पड़ी।

दो दिनों से छुट्टी होने की वजह से घर में पूरे दिन बोर हो जाता हूं। शरीर पर हो रहे पकने वाले दानों की वजह शर्ट भी नहीं पहना पाता ठीक है। इसलिये एक कुर्ता पहनता हूं जो काफी ढीला ढाला है। ज्यादा परेशानी नहीं होती है।

मेरे घर के सामने जो पार्क है उसमें पास के सरकारी प्राइमरी स्कूल के बच्चे खेला करते है। मेरा भी मनोरंजन हो जाता है। इन बच्चों के खेल निराले होते हैं। कभी मिट्टी में कूदने लगते है तो कभी टुटे हुए पार्क के झूले से लटकने लगते हैं। उनकी स्कूल यूनिफार्म भी ज्यादा साफ सुथरी नहीं होती, नीली रंग की शर्ट है और नेवी ब्लू पैंट, बेल्ट भी है, यहां तक की टाई भी है लेकिन किसी बच्चे की टाई छित्ती छित्ती हो चुकी है तो किसी की बेल्ट में बकल नहीं है। कुछ बच्चों की शर्ट की बाजुयें इतनी गंदी हो चुकी है कि लगता है कि बाजुओं की रंग काला है। कई दिनों से धुली नहीं है शायद। स्कूल की छुट्टी हो चुकी है लेकिन ये बच्चे खेलने में मस्त है। इन्हे घर जाने की जल्दी नहीं है। हर उम्र के बच्चे इस खेल चौकड़ी में शामिल है।

पार्क में हर तरह के बच्चे है कोई ब्रांडेड जूत पहने हुए है तो किसी के पांव की चप्पलें भी टूटी हुई है। ये जो कैटगरी है ब्रांडेड जूतो वाली, उनके पास अपना खेल का सामान है और ग्रुप भी जिसमें लगभग सभी ने ब्रांडेड जूते पहने है। उनका अलग ग्रुप है। और जब भी ये ग्रुप खेलने आता है। वो प्राइमरी स्कूल के बच्चे वहां से चले जाया करते हैं। उनका जाने का समय हो गया है। दो दो के ग्रुप में वो जा रहे है। एक छोटा बच्चा उम्र यही कोई दो ढाई फुट रही होगी। नीली शर्ट पहनी है जिसमें बाजुओं की बगलों में लाल रंग की सिलाई साफ दिख रही है। पैरों में हवाई चप्पल है, गोल चेहरा, गाल उभरे हुए, रंग सांवला है या कहें कि सांवले से थोड़ा ज्यादा काला है। गालों पर खुश्की के निशान है, बाल रुखे है, बेल्ट नहीं है, टाइ उसने जेब में रखी है, खेलते वक्त रख ली होगी शायद। किताबें नहीं है उसके हाथों में, और वो वापस जा रहा है अधूरा खेल छोड़कर। कभी कभी मुड़कर ब्रांडेड जूते वाले बच्चों की तरफ देखता है..रुकता है...फिर चल देता है घर की ओर। उनकी बॉल उसे पसंद है चमकीली सी।

पार्क के पास कई ठेले वाले अपना सामान बेचने की जुगत में है...आइसक्रीम वाला, अंगूर वाला, केले वाला, और शिकंजी , जलजीरे वाला। सभी मौजूद हैं, पार्क में से कई बच्चे उन ठेले वालो के पास से सामान खरीदते है। ढाई फुट वाला लड़का भी निकलते हुए ठेले वालों के पास जाकर खड़ा हो जाता है। सिर्फ देखता है। कुछ खरीदा नहीं। वो पीछे छूट रहा था तो उसके दोस्तो ने उसे आवाज लगाई, सुंदर...

आवाज सुनकर उसने अपने दोस्तों की तरफ देखा, फिर इशारे से आने की बात कहीं....वो बस चलने ही वाला था कि उसने अंगूर वाले के ठेले से एक अंगूर उठाने की कोशिश की। दुकानदार की नज़र पड गयी। वो चीखा “अच्छा चल भाग यहां से”। लडका डर गया और उसकी तेज़ आवाज सुनकर सरपट भाग निकला अपने दोस्तों के पास। उनके साथ हो लिया... वो खुश था भले ही उसको वो अंगूर नहीं मिले लेकिन वो हंस रहा था। अपने दोस्तों के साथ बातें करता चल जा रहा था। मै सोच रहा था कि एक अंगूर के लिये भी शाय़द उसके पास कुछ नहीं था। या फिर शायद ये अंगूर उसके लिये खट्टे थे।

बचपन की सीनरी वाला भविष्य

शुक्रवार, मार्च 05, 2010

सब कहने लगे कि रात बहुत हो गयी है सोने जाना चाहिये। मै उनको मना तो नहीं कर सकता था। सच में रात बहुत हो गयी थी। पर जिस तरह वो लोग सो गये उसे देखकर लगा कि दिनभर की थकान के बाद आदमी कितना निढाल होकर सोता है। मेहनतश आदमी रात में थकान के बाद अगर पत्थर पर भी सोना चाहे तो सो सकता है। उसे वहां भी अच्छी नींद आयेगी।

रात के 12 बजकर पांच मिनट हो रहे थे। सन्नाटा इतना था कि दीवार पर टंगी घड़ी की टिक टिक भी साफ सुनाई दे रही थी। कभी बांयी करवट लेता तो कभी दांयी करवट लेकिन नींद पता नहीं किस करवट लेटी हुई थी। उस रात तो जैसे मुझे उसने छोड़ दिया था अकेला। रात का चुप्पी को चीरती घड़ी की टिक टिक, मै एकटक दूसरी दीवार पर टंगी सीनरी पर बेसाख्ता देख रहा था। बचपन में बनाई जाने वाली सीनरी से काफी मिलती जुलती थी। उसमें भी पहाड़ थे। जिसका न ओर था और न ही छोर, उन पर हरा रंग लगा था। शायद चित्रकार हरियाली दिखाना चाह रहा था। जिस तेज़ी से पेड़ों की कटाई हो रही है उसे देखकर यहीं लगता है कि कुछ दिनों में इन चित्रों में ही पेड़ों और पहाड़ों के दर्शन हुआ करेंगे। एक के पीछे दूसरा उसके पीछे तीसरा। किसी पहाड़ की चोटी नुकीली है तो किसी की गोल, लगता है कि जैसे किसी पहाड़ में गु्स्सा ज्यादा है और किसी में है ही नहीं। सभी पर पेड़ों की बहार है। देवदार है शायद, क्योंकि जिस तरह ये पहाड़ों के पेड़ एक के ऊपर एक बने हैं ऐसे लगते हैं जैसे अंतरिक्ष में जाने को तैयार राकेट। दूर आसमान में किसी का निशाना बनाये हुए है। चोटी के पास शायद चित्रकार ने कुछ बर्फ भी गिराई है। इसलिये सफेद रंगों का समावेश है।

पहाड़ों का जिक्र हो और उससे निकलती नदी न हो तो लगता ही नहीं कि किसी पर्यावरण दृश्य को निहार रहे है। पहाड़ों के बीच से निकलती नदी है जिसका रंग नीला है। दिन के आसमान की तरह नीला। लगता है कि ये आकाश जैसे इस नदी रुपी शीशे में खुद को निहार रहा है। कभी बायें मुड़ती है तो कभी दायें। इधर उधर मुड़ती हुई सीधे जैसे इस चित्र से बाहर निकलने की तैयारी में है। शायद इन पहाड़ों से निकलती इस नदी को सागर से मिलना है और समुद्र तो इस चित्र में है ही नहीं। तो इसको तो बाहर आना ही है। अक्सर नदियों की आवाज़ को कल कल कल कहते है। लेकिन आज इसने आवाज बदली हुई है लगता है कि कुछ नाराज है इसलिये शांत है। नहीं तो रात के इस सन्नाटे में घड़ी की टिक टिक के साथ इसकी आवाज आती ज़रुर। पर नहीं आ रही है

नदी के एक तरफ एक ऐसा पेड़ है जिस पर मौसम के हिसाब से फल नहीं आया करते है। पसंद के हिसाब से फल आते है। अगर मुझे आम पसंद है तो उसमें पीले रंग का प्रयोग होता था नहीं तो प्रमोद उसमें हल्का लाल रंग करके सेब बताता था। लेकिन नदीं के किनारे का पेड़ हर मौसम में फल देता है, मै तो उसको जब भी अपनी अलमारी की सेफ में से निकालता हूं तो उसके आम ठंड के दिनों में भी ताज़े दिखाई देते है। लेकिन बस उन्हें मै खा नहीं पाता। ये पेड़ ठंड में भी हरा भरा रहता है। प्रदूषण का असर मेरे घर के बाहर खड़े पेड़ को भले सुखा रहे हो लेकिन कागज पर रंगों से उकेरे गये इस पेड़ का हरा रंग कभी फीका नहीं पड़ता है। आम भी हमेशा पीला होता है। हां उसके पास खड़ा लड़का पता नहीं क्यों उसको सिर्फ निहारता रहता है कभी उस पर पत्थर तक नहीं फेंकता है। कई सालों से उसे देख रहा हूं इस चित्र को मैने दसवीं कक्षा में बनाया था तब से लेकर आज तक कई साल हो गये लेकिन कभी इसने एक पत्थर भी उस ताज़े टिमटिमाते आम पर नहीं फेंके। लगता है कि उसे भी पेड़ पर सज़ा ये आम काफी पसंद है इसलिये वो इसको नहीं तोड़ता है।

इस पेड़ तक जाने के लिये नदीं पर एक छोटा सा पुल भी बना हुआ है। उस पुल के नीचे एक बत्तख ने अपना बसेरा बना लिया है। उसका अपना घर है वो ,कई सालो से है वहां। हिलती तक नहीं। डर है कोई कब्जा न कर ले, भू माफिया बत्तखों में भी होते हैं क्या ? नदी पार करो तो एक घर दिखाई पड़ता है। शहरों में तो मैने बहुत घर देखें है लेकिन ये घर कुछ अलग है। हल्के भूरे रंग का है। शायद उसको लकड़ी से बनाया गया है। क्या बताउं वो तो घर जैसा लगता भी नहीं है । ऐसा लगता है कि एक बड़ी झोपड़ी है। जिस पर एक चिमनी लगी है । उसमें सिर्फ एक दरवाजा है दरवाजे के काफी उपर एक खिड़की है शायद ये देखने के लिये कि कौन आया है। हां चिमनी से धुंआं आता रहता है। कुछ पक रहा है शायद। पता नहीं कौन रहता है। कभी उसको देखा नहीं बाहर घूमते हुए। दरवाज़े पर चार कुर्सियां पड़ी हुई है। एक गोल मेज है । दरवाजे के सामने एक छोटा रास्ता है। जो सीधे नदी के उस पुल से जुड़ा हुआ है। लगता है कि पेड़ के पास खड़ा लड़का उसी घर से निकल कर आया है।

इन पंछियों को बहुत दिनों से देख रहा हूं कि ये एक जगह पर रुके क्यों हुये है इनकी तो फितरत है उड़ना, पंखों को ऐसे मोड़ा हुआ है कि जैसे उड़ रहे है लेकिन कभी इस तस्वीर के बाहर न जा सके। इस घर के उपर हवा में पंखों से उड़े जा रहे है। हर पंछी का अपना जो़डा है, होना भी चाहिये नहीं तो एक जगह वो अकेले परेशान हो जायेंगे। इसलिये गिनती के आठ बनाये है। रंग उनका गाढ़ा भूरा है। चील या बाज होंगे शायद। पता नहीं। सूरज का रंग भी कुछ ज्यादा गाढा़ लाल हो गया है। शायद उसका अंत निकट है। लगता है कि सूरज घायल है उसका बचना मुश्किल है इसलिये खून में लतपथ आसमान में अपने आखिरी क्षण गिन रहा है। घर के बाहर की घास काफी हरी भरी है। अरे उसमें तो एक लाल आखों वाल खरगोश छुपा हुआ है कुछ खा रहा है शायद, नज़र नहीं आया, अच्छा है नहीं तो उसे भोजन करने कुछ परेशानी हो जाती ।

अरे लो देखते देखते शाम भी हो आयी है सूदूर दिखने वाला पृथ्वी का अंतिम छोर, वहां लगता है कि होली खेली जा रही है। काफी रंग आसमान में फैले है। कहीं लाल है उसके ऊपर गुलाबी, पीला, आसमानी नीला। और वो भी खत्म होते जा रहे है। अंधेरे का काला रंग किसी ने इस तस्वीर पर डाल दिया है। लेकिन अब भी वो बच्चा उस आम को निहार है जबकी उसको मै देख तक नहीं पा रहा हूं पता नहीं उसे कैसे नज़र आ रहा होगा कुछ।

किस्मत क्या है ?

बुधवार, फ़रवरी 17, 2010

मन दुखी है इसलिये कुछ ऐसा लिख रहा हूं जिसको पढ़कर हो सकता है कुछ लोगों को अजीब लगे। ये भी हो सकता है कि कुछ लोग मेरी बातों से सहमत हो। लेकिन जो मेरे साथ  हो रहा है उसको देखकर पता नहीं क्यों मुझे महसूस हो रहा है कि जो लोग किस्मत को बलवान बताते है शायद वो सही कहते है।

बहुत दिनों से बेकार घर बैठने के बाद एक जगह से कॉल तो आई नौकरी के लिये, हां ये बात अलग है कि उस कंपनी की हालत खराब है और वहां पर लोगों को तीन तीन महीने से सैलरी के दर्शन तक नहीं हुए है, लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों वहां से आये बुलावे ने मुझे वहां जाने के लिये मजबूर कर दिया। सोचा था कि जहां से करियर की शुरुआत हुई  और वहीं से लगभग अंत भी..तो मुझे लगा कि क्यों न जब एक और शुरुआत वहीं से करने को मिल रही है तो मौके का इस्तेमाल करना चाहिये। लोगों ने बहुत समझाया कि वहां जाना ठीक नहीं है, लेकिन घर बैठकर बेकार की बातें सोचने से अच्छा कहीं पर बिना सैलरी के काम करना है। वो भी तब जब आप खाली बैठे हों।

बुलावे पर चले तो गये,पर हालत सामान्य नहीं थे। बाकायदा वहां के एच आर से बात भी हुई, उन्होने इंटरव्यू भी लिया, चलो यहां तक तो ठीक था। अगले दिन ज्वाइनिंग का दिन था। ज्वाइनिंग का फार्म मेरे हाथ में था, मै उसको भरने ही जा रहा था कि अचानक मेरे फोन की घंटी बज उठी। मुझे फिर से एच आर के ऑफिस में तलब किया गया। वहां से मुझे वो अपने साथ न्यूज रुम की ओर ले गये। जहां पर बैठे ज्यादातर लोग मेरे जानकार थे। और शायद ज्यादातर शुभचिंतक भी। मुझे इंचार्ज से मिलवाया गया औऱ बस मै उनसे शिफ्ट की बात करने ही वाला था कि......

एक फोन बज उठा और उसको उठाने वाले व्यक्ति ने मुझको बताया कि एक बार फिर से मुझे एच आर के ऑफिस में बुलाया गया है। अब इस बार जो होने वाला था उसका मुझे अंदाज़ा कम ही था। क्योंकि जब आपके सामने सब कुछ ठीक चल रहा हो औऱ चीज़े फाइनल दौर में हो तो आल इज वैल...यहीं लगता है।

एचआर मुझसे पहले किसी और से बातों में मशगूल था। उनके बाद मेरा नंबर आया। कुछ देर चुप रहने बाद एच आर बोले
" शशांक देखो ऐसा है कि आपका समय बर्बाद करने के लिये सॉरी,
मैने पूछा क्यों सर क्या हुआ
देखो ऐसा है कि तुमसे पहले किसी को बुलाया था, पहले वो नहीं आ रहा था लेकिन अब आ गया है तो मै आपको अभी ज्वाइन नहीं करवा सकता हूं।

एक बार के लिये मै सन्न रह गया लेकिन फिर अपने आप को संभाला और एक सवाल दाग दिया
ठीक है सर पर..ये तो आपकी बात हुई...अब सच क्या है ये बता दीजिये।

देखो शशांक तुम तो जानते हो..कभी कभी लगाई बुझाई की वजह से हमें नीचा देखना पड़ता है। अब क्या कह सकते है इससे ज्यादा। बस तुम्हारा समय खराब करने के लिये माफी मांग सकता हूं। इतना कह सकता हूं कि फिलहाल तुमको नहीं रख सकते।


मै उनके इस जवाब के बाद चुप हो गया और चुपचाप उनके कैबिन से निकल कर बाहर आ गया, न सिर्फ बाहर बल्कि बिलकुल बाहर। उनके इस जवाब के बाद मुझे ज्ञात हो गया कि हो न हो किसी ने मेरे खिलाफ कोई न कोई साज़िश रच डाली है। न्यूजरुम में बैठे मेरे शुभचिंतक लगने वाले लोगों में से कोई न कोई मेरा दुश्मन था जो मुझे पसंद नहीं करता। लेकिन सच कह रहा हूं आज तक कभी मैने किसी को अपना दुश्मन नहीं होने दिया है।

इस घटना के बाद अब सोचने को मजबूर हो गया हूं कि ये कैसा किस्मत का खेल चल रहा है। एक तरफ सब ठीक होता नज़र आता है तो दूसरी तरफ राजनीति का शिकार होता मै। किसको दोष दूं खुद को, कंपनी की पालिसी को या फिर उस आदमी को जिसने मेरे खिलाफ साजिश रची  है।

क्योंकि पहले मै वहां पर काम कर चुका हूं इसलिये मेरे काम के बारे में वहां काम करने वाले लोग अच्छी तरह से जानते है। लेकिन अब किया भी क्या जा सकता है क्योंकि जिस देश का राजा निरंकुश हो वहां की हालत अच्छी कैसे रह सकती है। उसका को सर्वनाश उन्ही के पिछलग्गू ही करते है

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