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कसाब को फांस क्यो नहीं मिल रही ?

शुक्रवार, नवंबर 26, 2010

26/11 मुंबई हमले को दो साल हो गये। हर साल हमले की याद में श्रद्धांजलि देना त्योहार सा हो गया है। लोग इकट्ठा होते है और शहीदों को याद करते है। उनकी बहादुरी को सलाम करते हैं। लेकिन क्या इतने भर से  शहीदों को शांति मिल गई। सच कहे तो हमें क्या पता कि मृत्यु के बाद किसे शांति मिली किसे नहीं। लेकिन सवाल है कि शहीदों के नाम पर क्या हमारे दिलों को शांति मिली। नहीं....नहीं मिली। मारे तो गये थे सारे आतंकी लेकिन पकड़े गए एकमात्र ज़िंदा आंतकी आमिर अजमल कसाब की मृत्यु से हम भारतीयों को दिल को सुकून कब मिलेगा। फांसी की सज़ा मिले तो उसे काफी दिन हो गये।  केस चलता जा रहा है। मुझे तो लगता है कि वो अपनी प्राकृतिक मौत तो मरेगा ही साथ ही हमारे देश के करोड़ों रुपये भी खा लेगा। बहुत हुआ तो कोई हवाई जहाज अगवा करके उसे छुड़वाने की अपील करवा लेगा। लेकिन फिर भी हमारे देश के रुपये तो खाकर ही जाएगा।

सवाल है कि  आखिर कसाब जैसे दो टके के आतंकी को शाही ट्रीटमेंट क्यों दिया जा रहा है। इसके बारे में ज्यादातर लोग नहीं सोचते हैं। कसाब को अपने अंडे की तरह सेह रहे है। क्योंकि उसके दम पर ही हमे दुनिया को साबित कर सकते है कि पाकिस्तान ही आतंकी गतिविधियों का अड्डा है। मुंबई हमले को तरजीह इसलिये दी जा रही है क्योंकि इस हमले में विदेशी भी मारे गये थे। जिसकी वजह से इस मामले में पुरे विश्व की नजर इसके केस पर  टिकी है। इसी को भुनाने के लिये भारत सरकार नहीं चाहती कि कसाब को फांसी हो।

लेकिन हम भारतीय दिमाग से ज्यादा दिल से सोचते हैं। और अपने नजरिए से सोचूं तो ये सही भी है। सही इसलिये क्योंकि कसाब को फांसी देने या न देने के लिए हमें किसी को कुछ साबित करने की ज़रूरत नहीं है। हमें पूरे विश्व को ये नहीं दिखाना है कि कसाब को हमारे कानून की तरह से सज़ा मिलेगी। या फिर अमेरिकियों को ये बताने के ज़रूरत है कि पाकिस्तान ही आतंकी गतिविधियों का गढ़ है। हमारा देश अपंग तो है नहीं किसी दूसरे देश की मदद की ज़रूरत पड़ेगी युद्ध में। हम खुद अपनी सुरक्षा करने में सक्षम हैं।

ऐसे भारत सरकार के छुपे तर्क बेफिज़ूल है।

कसाब इस केस के बाद पाकिस्तान का हीरो हो गया होगा। हर साल हम तो मनाते है श्रद्धांजलि और वो मनाते है जश्न। हमे किसी और को नहीं बल्कि कि खुद को साबित करना होगा कि हम दृढ़ निश्चयी है। सवाल यही है आखिर कसाब को फांस क्यों नहीं मिल रही है। शायद कसाब की मौत ही शहीदों को सच्ची श्राद्धांजलि होगी

रात में पैसे लुट रहे है लूट लो ?

रविवार, जनवरी 31, 2010

ठंड की रातों में जहां एक ओर सभी नींद में दुबके हुए रजाई के आगोश में सो रहे थे। वहीं दूसरी तरफ मेरी आंखों में रात में पैसे कमाने का सपना जाग रहा था। अरे मै ही क्यों लगता तो ऐसा था कि ज्यादातर लोग जो अमीर बनने की तरफ अग्रसर हो रहे होते है। वो भी जागते है


क्या आपने कभी रात 12 बजे के बाद  जगने की कोशिश की है, रात को लगभग हर चैनल पर या तो बाबा लोग अपने कवच बेच रहे होते है या फिर कुछ चैनल,  लोगों को पैसे लुटवा रहे है। जी हां, आपको यकीन न हो तो आप हर रात 12 से दो बजे के बीच में पैसे लूटने का काम कर सकते है। हां पर करना ये है कि आपको सिर्फ या तो एक नंबर पर मैसेज करना है या फिर एक नंबर पर कॉल करना होता है। आप चाहे इमेजिन, ज़ी, जैसे किसी भी चैनल को चला लें, अगर बाबा कवच नहीं बेच रहे होंगे तो एक ज्यादा और बेतुकी बातें करने वाला एंकर आपको आपकी किस्मत के सहारे पैसे जितवा रहा हैं।

अब इस कार्यक्रम में जीतते कितने लोग है ये आप इसको देखकर समझ सकते हैं। मजेदार बात ये है कि इसमें वो पज़ल जैसा गेम खिलवाते है आपको बस उन चेहरो को पहचान कर पैसे कमा सकते है। यहीं नहीं इनाम की रकम भी बढ़ती जाती है। इसमें कोई सवाल भी नहीं है जैसा कि अमिताभ बच्चन के कौन बनेगा करोड़पति  में था। बस आपको फोन करना है या मैसेज करना है किस्मत का खेल है किस्मत है तो जीत है

लेकिन क्या आपने ट्राइ किया है। यकीन मानिये लोग लगातार कॉल या मैसेज करते रहते है, ये मै नहीं कह रहा हूं ये तो उसका एंकर कहता रहता है। और वो ये भी कहता है कि आप कॉल और मैसेज कर नहीं रहे हैं। लोग लगातार फोन करत  रहते है।  आपको जानकर हैरानी होगी कि जिन चार हिस्सों के पज़ल में हीरो या हिरोइन को पहचानने की बात की जाती है उसको एक बच्चा भी पहचान सकता है। लेकिन जिन लोगों के फोन स्टूडियो में जोड़ें जाते है वो तस्वीरों को पहचान तक नहीं पाते है। पहली बात तो आपका फोन लगेगा ही नहीं। और वो इसलिये की जब आपको पता चलेगा कि इन नंबर पर कॉल करना पैसों पर काल जैसा है। इन नंबर्स पर कॉल करने की दरें है 10 से 12 रुपये प्रति मिनट। 

जानकर हैरानी हो रही होगी। लेकिन इन नंबर्स पर आधे आधे घंटे लगातार होल्ड पर रहने के बाद भी आपको शायद ही स्टूडियों से जोड़ा जाये लेकिन आपके फोन के बिल.......हां हज़ारों में आ सकते है।

सवाल ये है कि  इस कार्यक्रम को दिखाने का लाभ क्या है। और इन कार्यक्रम को रात में ही क्यों दिखाया जाता है। और मंदी के इस दौर में इन जैसे कार्यक्रमों को दिखाने के पीछे क्या मकसद हो सकता है। यही नहीं जहां एक ओर सभी फोन कंपनियां अपने कॉल रेट कम कर रहे है वहीं दूसरी ओर इन कार्यक्रमों में 10 से 12 रुपये प्रति मिनट कॉल दर होने का क्या मतलब है।

इन कार्यक्रमों से सीधा सा मतलब निकाल जा रहा है कि ऐसे कार्यक्रम सिर्फ और सिर्फ लोगों को सपने बेचकर उनको बेवकूफ बनाने का ज़रिया भर है। पता नहीं लेकिन हो सकता है कि इन कार्यक्रमों में लोग जीतते भी कि नहीं पर कब है और कितने ये सवाल बड़ा है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय  को चाहिये कि इन कार्यक्रमों को दिखाने के पीछे क्या मकसद है और इसके ज़रिए कानूनी रुप से जुआ खिलाया क्यों जा रहा है। और इसको कानूनी जामा पहनाया जा रहा है चित्र पहचानने के सवाल को देकर।

मेरा इस पोस्ट को लिखने के पीछे यही मकसद था कि आपको ये जानकारी दी जाये कि इस तरह के कार्यक्रम में अपना लक न आज़माये। क्योंकि इसके ज़रिए सिर्फ आपको बेवकूफ बनाया जा रहा है। यही नहीं होल्ड पर रहने वाली मधुर आवाज के चक्कर में न पड़े ये सिर्फ कंप्यूटर में पहले से ही फीड लड़की की आवाज है जो आपको सिर्फ आपका बिल बढ़ाने के लिये आपका मनोरंजन करेगी। बस बाकी तो आप समझदार है।

हां ये नस्लीय की हिंसा है!...भारतीय सावधान

मंगलवार, जून 16, 2009


ऑस्ट्रेलिया.... इस देश का नाम आते सबसे पहले हमारे दिमाग में जो तस्वीर उभर कर आती है वो है वहां की क्रिकेट टीम...बेहतरीन खेल से वहां के खिलाड़ियों ने क्रिकेट की दुनिया में अपना खौफ़ कायम कर रखा था। लेकिन आजकल इस देश की चर्चा वहां के खिलाड़ियों के बेहतरीन खेल की वजह से नहीं बल्कि वहां पर हो रही हिंसा की वजह से हो रही है। ये हिंसा एक आम हिंसा नहीं है और न तो हो सकती है। इस हिंसा का शिकार हो रहे सिर्फ भारतीय। कभी तो वो छात्र होते हैं तो कभी वहां पर काम करने वाले आम भारतीय....पिछले कुछ महीनो पर नज़र डालें तो हम पायेंगे कि किस तरह से वहां पर हिंसा का दौर रुक नहीं रहा है औऱ जिसका शिकार भारतीय छात्र हो रहे हैं। इन हमलों में वहां की सरकार तो इस आम लूट पाट के लिए होने वाला हमला बता रही है पर असल में ऐसा है नहीं। वहां पर पिछले चालीस सालों से ज्यादा समय से भारतीय रह रहे हैं और वहां हमेशा से ही भारतीयों को अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता था। न सिर्फ भारतीय बल्कि वो देश जो विकासशील थे या ये कहें कि ऑस्ट्रेलिया के मुकाबले कम अमीर थे। उस वक्त यहां के लोगों में भारतीयों या यहां के लोगों प्रति कोई गलत भावना नहीं थी क्यों जिस तरह कम पैसे वाले या बेहाल को देखकर हम उनपर दया दिखाते हैं लेकिन जब वो हमसे आगे निकलने लगते है उस वक्त हमें जलन होती है उसी तरह जबा ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों का वर्चस्व बढ़ने लगा या कहें कि भारतीय पैसों के मुकाबले और अमीर होने लगे तो वहां के निवासियों को ये गवांरा नहीं हो रही है। यहीं कारण है कि वहां रह रहे 7 हज़ार टैक्सी चालकों में से साढ़े पांच हज़ार सिर्फ भारतीय ड्राइवर हैं और उन पर हमले के मामले कम होते हैं लेकिन पढ़े लिखे सभ्य़ और आर्थिक रुप से मजबूत भारतीयों या छात्रों पर लगातार हमलें हो रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के बारे आप वहां के खिलाड़ियों के बर्ताव से पता लगा सकते है कि कभी भी इंग्लैड और साउथ अफ्रीका या बड़े देशों के खिलाड़ियों से उनकी झड़पें कम होती थी लेकिन भारतीय, श्रीलंका, पाकिस्तान जैसे देशों से उनका बर्ताव मैदान पर भी दिख जाता है...भारतीय खिलाड़ियों से उनकी झड़पें तो कई बार सुर्खियां भी बटोर चुकी हैं। वहीं बांग्लादेश जैसे देशों से उनकी झड़पों की ख़बर नहीं आती है..क्यों? ...इसकी जवाब है कि ये देश उनकी वर्चस्व को चुनौती देती नहीं दिखती हैं। भारतीय खिलाड़ियों से उनके दुश्मनी का कारण यही है कि क्यों कि भारतीय उनके वर्चस्व को चुनौती देते थे। इसका सबसे चर्चित उदाहरण है आई पी एल में जब कोलकाता नाइट राइडर्स के खिलाड़ी अजीत अगरकर को की गई नस्लीय टिप्पणी जिसमें ऑस्ट्रेलियन कोच ने किस तरह उनसे कहा था कि ....तुम भारतीय वहीं करो जैसा कहा जाये... इस बात से सहज़ ही अंदाजा लग जाता है कि किस तरह गुलाम रखने की मानसिकता के साथ के पले ऑस्ट्रेलिया के लोग भारतीयों को अपने से नीचे समझते हैं और जब उनको इसकी चुनौती मिलती है तो इस तरह कि नस्लीय हिंसा समाने आती है। और ये हिंसा कई सालों से आ रही जब से भारत आर्थिक रुप से प्रगति कर रहा है। और एक बात औऱ कि ये हालात सिर्फ ऑस्ट्रेलिया में नहीं है सभी जगह शुरु होने वाले हैं क्यों कि सभी जगह आर्थिक मंदी है और भारतीयों के इसकी फिक्र नहीं हो क्यों भारत में इसका ज्यादा असर देखने में नहीं आया है। इसलिये इसका समाधान कुछ नहीं है कोई भी सरकार इसका हल नहीं निकाल सकती है। क्यों कि इस सोच का हल नहीं है। हां एक चीज है जो हो सकती है और वो ये कि सभी भारतीय एकजुट होकर रहें औऱ सभी घटनाओं का मुंहतोड़ जवाब दें.....

क्यों दे वोट

गुरुवार, अप्रैल 23, 2009

टीवी पर बहुत दिनों से एक विज्ञापन चल रहा है जिसमें एक लड़का लोगों चाय पिलाने के बहाने वोट देने के लिए समझाता है या कहें कि उकसाता है...पर उसमें एक लड़की ने एक सवाल पूछा था कि वोट दो वोट दो किसे वोट करें तो वो लड़का कहता है जागो रे डाट काम पर जाए और लागिन करें...सवाल ये है कि किसे वोट करें इसलिए नहीं कौन नेता है हमारे क्षेत्र में ...बल्कि इसलिए कि क्यो वोट करें॥आज हम वोट करें किसी नेता को चुनाव के बाद पता चले कि वो तो पार्टी बदल कर गठबंधन कर ले ....इसका उदाहरण है लालू प्रसाद यादव...जो यूपीए सरकार में रेलमंत्री रहने पर सोनिय गांधी और मनमोहन सिंह के चालिसा कहा करते थे...और आज जब चुनाव हो रहे हैं तब लालू विष उगल रहे हैं कांग्रेस के ख़िलाफ़॥गिरगिट भी इतनी तेज़ी से रंग नहीं बदलता जितनी तेज़ी से हमारे नेता रंग बदलते हैं.....एक क्षेत्र से पांच प्रत्याशी खड़े हों और फिर पता चले कि सभी पर आपराधिक मामले दर्ज हों आप किसे वोट कर सकते हैं॥एक समझदार आदमी तो शायद किसी को वोट न करे॥लेकिन अगर कभी मुझे वो महाशय मिल जाए जो उस विज्ञापन मे वोट करने की अपील कर रहे थे तो मै उनसे पूछूं कि किसे वोट करूं तो वो तो कह देंगे कि जागो रे जागो रे जागो रे जागों रे रे रे रे रे रे ...लेकिन कैसे जागें अपराधियों को वोट देकर तो मै नहीं जागुंगा...समस्या ये हैं कि मेरे क्षेत्र में अपराधी हो तो मुझे हक होना चाहिए कि मै अपने नेता को वोट दूं न कि किसी ऐसे को जो गुंडा हो....पता नहीं ये हक हमें कब मिलेगा...जब मिलेगा तब वोट करुंगा......तभी जागुंगा अभी सोने दो....

क्या सभी जगह ऐसा ही है.....

बुधवार, अप्रैल 22, 2009

मै जहां काम करता हूं॥वहां अजीब सा माहौल रहता है॥सभी लोग अपने काम व्यस्त रहते हैं पर सभी को पता रहता है कि उनकी मेहनत का फल उन्हें नहीं मिलने वाला और अगर मिलेगा भी तो इतना घिसना पड़ेगा कि आपकी इच्छा ही मर जाएगी...यहां पर लोगों पता है कि उनकी सैलरी इतना घिसने के बाद आएगी कि तब तक आप को अपना स्वाभिमान बेच कर दूसरों से उधार तक लेना पड़ेगा॥यहां तक की सैलरी इतनी देर से आती है कि लोगों को ये याद तक नहीं रहता कि उनकी कौन से महीने की सैलरी रुकी पड़ी है...बड़े ही धूम धाम से बड़े बैनर का नाम देखकर आए लोगों की हालत ये है कि अब कोई काम ही नहीं करना चाहता और सिर्फ खानापूर्ति करते रहते हैं...जहां पर आपकी मेहनत को कोई देखने वाला न हो ॥आपके अच्छे काम को कोई सम्मान न दे वहां ऐसे ही काम होता है॥हां एक बात है कि ऐसी जगहों पर ऐसे लोग काम करते हैं जो दूसरों की ग़लतियों पर बहुत ध्यान देते हैं॥इसलिए ऐसी जगहों पर काम बस काम होता है पूजा नहीं ...और जिस काम को आप पूजा समझकर ना करते हों वो काम कभी भी पूरा नहीं होता और अगर हो भी जाता है तो बस हो ही जाता है.....ऐसे काम के शिकार लोग यहां ज्यादा मिलते हैं....शिकार बने लोग बस तड़पते हैं बच नहीं पाते...इसी का शिकार यहां वो बच्चे हो रहे हैं जो आए तो उसी फर्म के इंस्टिट्यूट से जहां वो काम करते हैं पर ये भी यहां सिर्फ शोषित हो रहे हैं...जो काम तो कर रहे हैं लेकिन उन्हें उनका मेहनताना नहीं मिल रहा है......सिर्फ कोल्हू के बैल की तरह काम कर रहे हैं और फ्री का मजदूर किसे नहीं अच्छा लगता है॥ये फर्म भी यही चाह रही है और इन छोटे बच्चों को फ्री के मजदूरों की तरह जब तक ज़रूरत हो उनका ख़ून चूसते रहेगें काम करवाते रहेंगे लेकिन देंगे कुछ भी नहीं और जब ये बच्चे मांग करते रहेंगे तब तक टरकाते रहेंगे और जब हद हो जाएगी या कहें कि ज़रुरत पूरी हो जाएगी तो फेंक देंगे॥सवाल ये है कि क्या सभी फर्म में ऐसा ही होती है??????

कहां है आदर्श आचार संहिता

बुधवार, मार्च 18, 2009

लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद चुनाव की आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है पर जिस देश के राजनीतिज्ञ को वहां के आम लोग अपना आदर्श मानना छोड़ दें । वहां के राजनीतिज्ञों से आदर्श आचार संहिता का पालन करने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। एक बात का तो कम से कम हम आम वोटरों को दिमाग में रखना ही चाहिए कि पूरे पांच सालों बाद लोकसभा के चुनाव आते हैं। ये बात अलग है कि ऐसी नौबत कम ही आईं है। और फिर अबकी बार सरकार ने पूरे पांच साल भी पूरे कर लिए है । ऐसे में चुनाव होने वाले हों तो हर नेता यही कहेगा न कि कौन सी आचार संहिता ? कैसी आचार संहिता ? सब चलता है मेरे दोस्त । अपने ही वोटरों को सपने दिखाकर ख़ुद के सपने पूरे करने के बाद भी हर चुनाव में हमारे राजनेता वोट मांगने से ज़रा सा भी नहीं कतराते हैं । कभी होली का नेग कहकर पैसा दिया जाता है तो कभी मौलाना पर पैसे की गंगा बहाई जाती है। कोई नेता सिनेमा हॉल में फिल्म दिखाकर अपने कार्यकर्ताओं समेत सभी लोगों को आचार संहिता का पालन करने का संदेश देने का पाठ भी पढ़ाते हैं । अरे भाई जो लोग संसद की मर्यादा का पालन नहीं कर पाते वो चुनाव की आदर्श आचार संहिता की पालन कैसे कर सकेंगे।

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